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कहां है आधार

केंद्र सरकार ने ‘आधार’ पहचानपत्र की उपयोगिता खूब गिनाई थी और जल्दी ही इसे सभी देशवासियों को मुहैया कराने के वायदे भी किए थे, पर आधार कहां है, उसे वितरित करने की गति कैसी है, किसी को कुछ पता नहीं। 10 अक्तूबर, 2011 को आधार कार्ड के लिए हमारी तस्वीरें ली गई थीं, परंतु करीब सात माह बीत जाने के बाद भी हमें आधार कार्ड नहीं मिला। क्या कोई बताएगा कि इतने दिन बीत जाने के बाद भी अब तक आधार कार्ड क्यों नहीं मिला? अब जिस योजना का आधार ही इतना कमजोर हो, उसका भवन कितना मजबूत होगा, इसका अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है। संबंधित अधिकारी बताएं कि हमारे आधार कार्ड कब तक हमें मिलेंगे।
सुरेंद्र गोयल, प्रिंटर्स अपार्टमेंट, सेक्टर-13, रोहिणी

बिजली, पानी और सड़क
जैसे-जैसे गरमी बढ़ रही है, दिल्ली में एमसीडी चुनावों के अभियान भी गति पकड़ रहे हैं। चुनाव प्रचार के लिए जहां उम्मीदवार पसीने बहा रहे हैं, वहीं जनता भी काफी उम्मीदें लगाए बैठी है। चाहे चुनाव कोई भी क्यों न हो, जनता तो सिर्फ विकास चाहती है। हमेशा से देखा जाता रहा है कि जब भी कोई चुनाव होता है, तो तीन मुद्दे जरूर उठते हैं- बिजली, पानी और सड़क। आखिर, जनता इनसे जुड़ी समस्याओं से कब तक लड़ती रहेगी? चुनाव के समय वायदों की झड़ी खत्म नहीं होती, मगर चुनाव खत्म होते ही इनकी बत्ती गुल हो जाती है। जाहिर है, जनता को वोट के बदले में अब तक सिर्फ महंगाई और वायदाखिलाफी ही मिली है। लेकिन अब वह वायदों का हिसाब भी लेगी।
मनीष कुमार, नेहरू प्लेस, नई दिल्ली

संयम की जरूरत
‘सेना की प्रतिष्ठा’ शीर्षक संपादकीय पढ़ने को मिला। निस्संदेह यह चिंतनीय स्थिति है, क्योंकि देश की प्रतिष्ठा सेना से जुड़ी है। यदि सेना प्रमुख ही अपने कर्तव्यों का सही ढंग से पालन नहीं करेगा, तो सेना की प्रतिष्ठा पर ही प्रश्नचिन्ह लग सकता है। संपादकीय में उठाए गए सवाल काफी मायने रखते हैं कि इतने महत्वपूर्ण पद पर होते हुए भी थल सेनाध्यक्ष ने अब तक चुप्पी क्यों साधे रखी तथा समय रहते कार्रवाई क्यों नहीं की? चिंता की एक बात यह भी है कि महत्वपूर्ण पदों पर बैठे लोग भी यदि एक सामान्य आदमी सरीखी भाषा बोलने लगेंगे, तो देश का क्या हाल होगा? इसलिए यह समय चिंतन करके नीर-क्षीर विवेक संपन्न दृष्टिकोण अपनाने का है। शीर्ष पदों पर बैठे लोगों को यह अंदाजा होना चाहिए कि उनकी कही हर बात का व्यापक समाज पर असर पड़ता है, इसलिए बोलने में संयम जरूरत बरतें।
सुधाकर आशावादी, शास्त्री भवन, ब्रहमपुरी, मेरठ

जरदारी का आना
वह आए, मुस्कराए, हाथ हिलाए, गले मिले और चले गए। हम इंतजार करते रहे कि वह हिन्दुस्तान को कभी न भूलने वाले दर्द देने वाले जालिमों के बारे में कुछ बोलेंगे, पर उन्होंने कुछ नहीं कहा। क्या ऐसे में हम जरदारी पर भरोसा कर सकते हैं? ऐसे में, बाल ठाकरे ने गलत क्या कहा कि जरदारी की दुआ कबूल नहीं होगी। सही है, गरीब नवाज दिल से प्रायश्चित करने वालों का ही गुनाह माफ करते हैं।
रमेश वाही, गुरु रामदास नगर, दिल्ली-92

महंगाई
उलझ रहे हैं
जिंदगी के तार,
करार के चक्कर में
सब हैं बेकरार।
उधार की जिंदगी के
होते हैं दिन चार!
वीरेन कल्याणी, विश्वास नगर, दिल्ली

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