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थोड़ी देर की बातचीत ने खोले उम्मीदों के नए दरवाजे

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी के बीच  हुई 40 मिनट की बातचीत नतीजों के हिसाब से सार्थक कही जा सकती है। इतने कम वक्त में कई दशक से उलझे मुद्दों का समाधान नहीं हो सकता। लेकिन बड़ी बात यह है कि दोनों देशों के बीच शून्य पर आ पहुंची बातचीत की प्रक्रिया पटरी पर लौट आई है। मनमोहन सिंह की पाकिस्तान यात्रा से इसमें और
गति आएगी।

व्यापार से कूटनीति पर प्रभाव : आमतौर पर ऐसी बातचीत में व्यापार को तरजीह नहीं दी जाती। क्योंकि यह गैर-राजनीतिक मुद्दा लगता है। लेकिन द्विपक्षीय व्यापार पर बातचीत हुई। आने वाले समय में व्यापार दोनों देशों के रिश्तों में अहम भूमिका निभा सकता है। आर्थिक रूप से बदहाल पाकिस्तान के लिए यह काफी फायदेमंद होगा। इसमें भारत का भी हित है। व्यापार बढ़ा तो संबंधों में सुधार चाहने वाले पक्षकारों की संख्या भी बढ़ेगी। 

सईद पर कार्रवाई नए सुबूतों से संभव : हाफिज सईद के खिलाफ कार्रवाई की बात भारत ने दोहराई है। शुरू में दबाव में आकर पाकिस्तान ने हाफिज के खिलाफ कार्रवाई की। लेकिन लाहौर हाईकोर्ट ने रिहा कर दिया। पाक सुप्रीम कोर्ट में रिट दायर हुई लेकिन कुछ नहीं हुआ। यदि सईद के मामले में कानूनी पक्ष कमजोर था तो मुंबई हमले के अन्य गुनहगारों पर कार्रवाई क्यों नहीं की। अन्य ‘मोस्ट वांटेड’ की सूची भी उसके पास है। भारत को चाहिए कि वह सईद के खिलाफ और पुख्ता सुबूत सौंपे।

जरदारी से उम्मीद : प्रधानमंत्री को पाकिस्तान बुलाकर जरदारी ने मंशा जता दी कि वह नई शुरुआत के इच्छुक हैं। मुझे उम्मीद है भारत द्वारा सौंपे गए मोस्ट वांटेड की सूची में शामिल कुछ आतंकियों के खिलाफ पाकिस्तान कदम उठा सकता है। पिछले दिनों पाकिस्तान के न्यायिक आयोग ने भारत आकर तथ्य जुटाए थे। जो हाफिज सईद के खिलाफ न सही, अन्य के खिलाफ कार्रवाई का आधार तो बन ही सकते हैं।
(बातचीत पर आधारित)

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