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चश्मा उतारो, फिर देखो यारो

कहा जाता है कि हकीकत तब हकीकत नहीं रहती, जब आप उसे किसी चश्मे से देखते हैं। लेकिन इंटरनेट कंपनी गूगल ने जो चश्मा बनाया है, उसके बारे में दावा यह है कि वह हकीकत को और बेहतर बना सकता है। इस ‘बेहतर’ हकीकत को उसने ऑगमेंटेड रियलिटी यानी संवर्धित यथार्थ का नाम दिया है। वैसे पहली नजर में यह चश्मा हकीकत कम किसी फंतासी वाले फसाने का खिलौना ज्यादा लगता है। कुछ वैसी ही सुविधाओं वाला, जैसी सुविधाएं ओसामा बिन लादेन को मारने वाले अमेरिकी मैरीन कमांडों के हेलमेट में थी। कुछ लोगों ने इसे टर्मिनेटर चश्मे का नाम भी दिया है, उस फिल्म के पार्ट टू में हीरो के पास कुछ ऐसा ही एक चश्मा था। हम चाहें, तो अपनी सुविधा के लिए इसे ‘रजनीकांत चश्मा’ भी कह सकते हैं। पर यह चश्मा न फंतासी है और न फसाना, गूगल का दावा है कि इस साल के अंत में क्रिसमस तक यह बाजार में आ जाएगा।

इस चश्मे को पहनकर आप आते-जाते, उठते-बैठते हर समय इंटरनेट से जुड़े रह सकते हैं। इस चश्मे से आप दुनिया भी देखेंगे और अपना ई-मेल अकाउंट भी चेक कर लेंगे। नए संदेश चश्मे के लेंस पर अपने आप फुदककर पॉप-अप कर जाएंगे। बैठे तो आप बस में होंगे, लेकिन फेसबुक के जरिये आप अपने सारे दोस्तों से जुड़े होंगे। यह चश्मा आपको राह भी दिखाएगा और मौसम का हाल भी बताएगा। यह आपको ट्रैफिक जाम वाली सड़कों की तरफ जाने से रोकेगा और मंजिल पर पहुंचने का वैकल्पिक रास्ता भी बताएगा। मोटे तौर पर यह वह सब कुछ करेगा, जिसे हमारे स्मार्ट फोन कुछ हद तक करते हैं।

गूगल ने इस चश्मे का वीडियो जारी किया, तो कुछ ही घंटे में यू-टय़ूब पर इसकी पैरोडी भी आ गई। यह कहा गया कि चश्मा खरीदिए और दुर्घटनाएं मुफ्त लीजिए। यह सिर्फ मजाक का मामला नहीं है। पिछले दिनों दिल्ली के आस-पास ऐसे कई जानलेवा हादसे हुए हैं, जहां दुर्घटना के शिकार व्यक्ति के दोनों कान में इयरफोन लगे हुए थे। अब गूगल ने कहा है कि यह चश्मा सिर्फ जरूरत के वक्त पहनने के लिए है, हर समय पहनने के लिए नहीं। अब यह पूछा जा रहा है कि क्या ऐसे उत्पादों पर यह वैधानिक चेतावनी लिखा जाना जरूरी नहीं होना चाहिए कि सार्वजनिक स्थानों पर इनका इस्तेमाल जानलेवा हो सकता है।

वैसे इस तरह के उपकरण जानलेवा तभी होते हैं, जब सार्वजनिक स्थानों पर उनका इस्तेमाल करते हुए उनमें इतना खो जाते हैं आप कि खुद को आस-पास के माहौल से काट लेते हैं। ऐसी दुर्घटनाएं कभी-कभार ही होती हैं, लेकिन ऐसे लोग आपको अक्सर मिल जाएंगे, जो आई-पॉड या मोबाइल के इयर फोन कान में ठूंसे हुए खुद को अपने आस-पास के समाज से अलग कर लेते हैं। क्या आप ऐसे किसी व्यक्ति से रास्ता पूछना चाहेंगे?

इसे स्मार्ट फोन का विकल्प बताया जा रहा है, इसलिए वे विवाद भी उठ रहे हैं, जो स्मार्ट फोन से जुड़े हैं। सबसे बड़ा विवाद फेस रिकॉगनीशन एप्लीकेशन को लेकर है, जिस पर कई मानवाधिकार संगठनों ने प्रतिबंध लगाने की मांग की है। इस एप्लीकेशन की मदद से आप किसी की भी तस्वीर खींचकर इंटरनेट पर उसकी सही पहचान और उसका पूरा इतिहास जान सकते हैं। गूगल के चश्मे में यह एप्लीकेशन और भी खतरनाक हो सकता है। आपको कैसा लगेगा अगर ट्रेन में आपकी सीट के सामने बैठा सहयात्री दो मिनट में ही बिना आपसे बातचीत किए यह जान ले कि आप बहुत गरम मिजाज के हैं, आप मांसाहारी लोगों से नफरत करते हैं, सीबीएसई की परीक्षा में गणित में आपके सौ में 32 नंबर आए थे, आपका तलाक हो चुका है और आपने गाड़ी ड्राइव करते हुए अभी तक पांच दुर्घटनाएं की हैं, तो नतीजा क्या होगा? हम सबकी जिंदगी के कुछ ऐसे सच होते हैं, जो कुछ बहुत नजदीकी लोगों को ही पता होते हैं। हम हमेशा ही ऐसे अतीत को भूलते-भुलाते आगे बढ़ने की कोशिश कर रहे होते हैं। जब हम किसी सार्वजनिक जगह पर अजनबी लोगों के बीच होते हैं, तो हमारा उन सबसे जो रिश्ता बनता है, वह इस अतीत और हमारी पृष्ठभूमि के तनावों से अलग होता है। अब कल्पना कीजिए कि आप जिस ट्रेन में सफर कर रहे हैं, उसमें सभी लोगों ने उसी तरह का चश्मा लगा रखा है, तो क्या होगा? अभी तक जब अजनबी लोग मिलते हैं, तो उनके बीच अतीत के अनजानेपन और वर्तमान की जरूरतों का एक सोशल नेटवर्क बनता है, जिसकी अपनी एक ऊष्मा होती है। फेस रिकॉगनीशन से आप इस ऊष्मा की कल्पना नहीं कर सकते, क्योंकि यह सार्वजनिक स्थलों को हमाम में बदल सकता है।

एक और चिंता इस तकनीक के व्यावसायिक इस्तेमाल के खतरों को लेकर है। इंटरनेट से लेकर ई-मेल और एसएमएस तक संचार की जितनी भी सुविधाएं हमने हासिल की हैं, देर-सवेर विज्ञापन उसमें घुसपैठ कर ही लेते हैं। बाकी जगह उन्हें कुछ हद तक नजरंदाज किया जा सकता है, लेकिन अब अगर वे सीधे आपकी आंख पर चढ़े चश्मे में चमकेंगे, तो क्या आप उनसे नजरें फेर पाएंगे। हम यह भी जानते हैं कि किसी भी तरह के फॉयरवॉल या डू-नॉट-डिस्टर्ब-मी रजिस्ट्री आदि के जरिये इन्हें पूरी तरह नहीं रोका जा सकता। शायद आंशिक तौर पर भी नहीं। ऐसा हुआ, तो हमारे पास कोई विकल्प नहीं होगा सिवाय सरकार या सरकारी संस्थाओं का सहारा लेने के। एसएमएस से आने वाले विज्ञापनों का उदाहरण बहुत दूर का नहीं है।

मोबाइल उपभोक्ताओं के इस सिरदर्द को आखिर में सरकार की मदद से ही रोका जा सका। वह भी कुछ हद तक ही। उसके लिए टेलीकॉम रेगुलेटरी अथॉरिटी को मोबाइल से किए जाने वाले एसएमएस की संख्या को सीमित करना पड़ा। यह उन नौजवानों पर भारी पड़ा, जो सुबह से शाम तक एसएमएस की जरिये ही संवाद करते हैं। इस तरीके में आपत्ति सिर्फ इतनी है कि अभी तक हमारी संचार की सारी तरक्की सरकारी सेंसर से मुक्ति की ओर जा रही थी, अब हम फिर से उस ओर बढ़ सकते हैं, जहां सरकारी सेंसर पर निर्भरता हमारी मजबूरी हो। इसके भावी खतरे क्या हैं, यह हम शायद अभी ठीक से नहीं जानते।

एक चीज और, अक्सर जब आप अकेले होते हैं, तो अपने बारे में, अपनी दुनिया के बारे में, अपने सपनों, लक्ष्यों के बारे में सोचते हैं। यह सब आपको राहत भी देता है, अपने अंदर झांकने का मौका भी और कई बार आगे का रास्ता भी दिखाता है। लेकिन क्या हर समय इंटरनेट से जुड़े रहकर आप ऐसा कर सकते हैं? 

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