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हमें बलूचिस्तान का साथ क्यों देना चाहिए

इस साल जब से मैंने बलूचिस्तान के लोगों के आत्म-निर्णय के अधिकार को मान्यता देने संबंधी एक प्रस्ताव कांग्रेस में पेश किया है, तभी से खलबली मची हुई है। आठ फरवरी को विदेश मामलों की उपसमिति की सुनवाई के बाद मैंने  इस प्रस्ताव का प्रारूप तैयार किया था। उपसमिति बलूचिस्तान में पाकिस्तानी सुरक्षा बलों द्वारा मानवाधिकारों के स्तब्ध करने वाले उल्लंघनों पर गौर कर रही थी। अमेरिकी विदेश मंत्रालय, एमनेस्टी इंटरनेशनल और अन्य मानवाधिकार संगठनों ने इस बात की पुष्टि की है कि पाकिस्तानी सत्ता प्रतिष्ठानों द्वारा बलूच लोगों का जबर्दस्त दमन किया जा रहा है। उनकी हत्याएं की जा रही हैं, उन्हें अगवा किया जा रहा है, उन्हें गैर-कानूनी रूप से हिरासत में रखने के साथ-साथ बर्बर तरीके से प्रताड़ित किया जा रहा है। इन कृत्यों के लिए इन संगठनों ने पाकिस्तानी प्रशासन की भर्त्सना भी की है।

कुछ लोग आरोप लगा रहे हैं कि मेरे द्वारा इस मसले को उठाए जाने से अमेरिका-पाकिस्तान के रिश्तों को नुकसान पहुंचा है। पाकिस्तानी प्रधानमंत्री  गिलानी ने तो इस विधेयक की तीखी आलोचना भी की। पाकिस्तानी विदेश मंत्रलय ने इसके खिलाफ अपना विरोध दर्ज कराने के लिए इस्लामाबाद स्थित अमेरिकी दूतावास के अधिकारियों को दो-दो बार तलब किया। पाक मीडिया ने भी इस प्रस्ताव के खिलाफ तल्ख संपादकीय टिप्पणियां लिखी हैं और इस्लामाबाद की सड़कों पर विरोध प्रदर्शन भी हुए हैं। मुझे लगता है कि ये विरोध प्रदर्शन अतिरंजित थे। वास्तव में, पाकिस्तानी बुद्धिजीवी झूठ से नहीं, बल्कि सच्चाई से परेशान हैं। बलूचिस्तान पाकिस्तान का सबसे बड़े क्षेत्रफल वाला सूबा है, जो ईरान व अफगानिस्तान से सटा हुआ है। प्राकृतिक संसाधनों से मालामाल होने के बावजूद इसके साथ औपनिवेशिक बर्ताव होता रहा। इस्लामाबाद के सत्तासीन कुलीनों की समृद्धि के लिए इसकी प्राकृतिक गैस, स्वर्ण खदानों, यूरेनियम और तांबे का दोहन होता रहा, जबकि बलूच भयानक गरीबी में जी रहे हैं।

इसलिए मेरा प्रस्ताव इंसान की खुदमुख्तारी के प्रति मेरी प्रतिबद्धता से प्रेरित है। मैं इस बात का हिमायती रहा हूं कि अपने सांस्कृतिक मूल्यों व अस्मिता के आधार पर लोगों को अपनी नियति खुद तय करने का हक होना चाहिए। पाकिस्तान के भीतर ऐसे अनेक अच्छे लोग हैं, जो समझते हैं कि बलूचों के साथ पाकिस्तानी सुरक्षाकर्मियों की ज्यादती उनके मुल्क के लिए एक बदनुमा दाग है। इसलिए हमें उस पाकिस्तानी हुकूमत का खामोश साथी बनकर नहीं रहना चाहिए, जो अपने ही अवाम के खिलाफ डरावने कुकृत्यों में शामिल है और जो अमेरिकियों पर हमले करने वाले आतंकियों का साथ देती रही है, यहां तक कि 9/11 के गुनहगारों का भी।
(ये लेखक के अपने विचार हैं) 

 

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