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अस्पताल से देवालय अधिक क्यों

कभी निठल्लों का अड्डा पान की दुकानें हुआ करती थीं, उसके बाद कॉफी हाउस। आजकल मॉल हैं। एक जमाना था, हम भी कॉफी हाउस जाते थे। बैठे-ठाले बुद्धिजीवियों की जमात में कौन शरीक नहीं होना चाहेगा? अब विवशता है। सर्विस टैक्स की अति ने ऐसी दुर्गति की है कि हम कॉफी की महंगाई के शिकार हो गए हैं। ऐसे में, शेष शरण-स्थली पान की ही दुकान है। दफ्तर में मक्खी नहीं मारी, वहां गप्पें मार लीं। कल हम पहुंचे, तो किसी समझदार ने उधार का अखबार पढ़कर अपना निष्कर्ष सुनाया, ‘देखा आपने, पिछले दस वर्ष में सूबे ने कितनी तरक्की की है? आंकड़ों के अनुसार, हमारे राज्य में देवालय बढ़े हैं, चिकित्सालय घटे हैं।’

एक अन्य ने उनकी अहमियत कम की, ‘इसमें कैसा आश्चर्य! हम धर्म-प्रधान देश है। राम-कृष्ण की भूमि पर पूजाघर नहीं, तो क्या चिड़ियाघर बढ़ेंगे?’ एक और आवाज गूंजी, ‘डिस्पेन्सरी-अस्पतालों का घटना तो लाजमी ही है। जो दुआ पर जिंदा हैं, उन्हें दवा से क्या लेना-देना?’

एक सज्जन ने बहस को नया आयाम दिया, ‘जो पूजा-स्थल के जरिये मुमकिन है, वह डिस्पेन्सरी-अस्पताल से बिल्कुल नामुमकिन है। हमारे मोहल्ले में भू-माफिया ने मंदिर बनवाकर सार्वजनिक पार्क को ऐसा हथियाया कि अब वह वहां पर रिहाइशी फ्लैट बनवा रहा है। पूजा स्थलों में भक्त चढ़ावा चढ़ाते हैं, और सरकारी कार्यालयों में भू-माफिया। दोनों अपने-अपने आराध्य को पटाते हैं। अब साकार दादा तो पूरे देश ने देखा है, निराकर किसी ने नहीं।’

इसी विचार को दूसरे ने आगे बढ़ाया, ‘हम तो मानते हैं कि धर्मभीरू श्रद्धालु किसी और सदी के भटके हुए लोग हैं, आज के समय के असली स्वामी तो जमीन से जुड़े बिल्डर हैं। मंदिर ही नहीं बनवाया, साक्षात अर्थ का भी जुगाड़ किया और मोक्ष का भी।’ अब शंकालु कहां नहीं हैं? सो एक बोला, ‘पर यह देश तो सेक्युलर है?’

‘तभी तो यह संभव है। सबको आजादी है। कानून का कोई हस्तक्षेप नहीं है। कोई पार्क पूजता है, तो कोई पूजाघर का प्रभु।’ ‘हरि अनंत, हरि कथा अनंता’ वाली इस बहस से हम छिटक लिए। अपनी बस आ चुकी थी।

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