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गुनगुनाएं और स्वस्थ रहें

जब आप बढ़िया मूड में होते हैं, तो सहज ही गुनगुनाने लगते हैं। इस गुनगुनाने का संगीत के ज्ञान से कोई संबंध नहीं है। यह तो दिल की खुशी है, जो सुर बनकर कंठ से फूट पडती है। स्वीडन में कुछ स्वस्थ लोगों को रोज कुछ समय तक गुनगुनाने की शिक्षा दी गई। पता पड़ा कि उन्हें साइनस की जो भी तकलीफ थी, वह दूर हो गई और सांस से संबंधित जो अवरोध थे, वे दूर हो गए। सांस से ही जुड़ी होती हैं भावों की ग्रंथियां, वे भी धीरे-धीरे पिघलने लगीं। देखा गया कि ये लोग दिन भर ज्यादा प्रसन्न रहने लगे।

यह खबर पढ़कर ओशो के नादब्रह्मा ध्यान की याद आ गई। नादब्रह्मा का मतलब है वैश्विक ध्वनि। जो ध्वनि पूरे विश्व में है, वह मनुष्य के भीतर भी है। इस ध्यान में 30 मिनट तक शांत बैठकर आंखें बंद करके गुंजन यानी ‘हमिंग’ करना होता है। इतनी समग्रता से कि आपका पूरा शरीर झनझनाने लगे, जैसे वह बिजली का खंभा हो। यह झनकार आपके मस्तिष्क की कोशिकाओं में प्रवेश करती है और इसके कारण वे भी जागृत होती हैं। इससे मस्तिष्क के वे हिस्से, जो सामान्यतया काम में नहीं लाए जाते, वे भी सक्रिय हो उठते हैं और एक अनोखी ताजगी का अनुभव होता है। मस्तिष्क और शरीर, दोनों ही जब एक लय में, एक तरंग में तरंगायित हुए, तो दोनों में समस्वरितता बनी। यह स्थिति इतना चैन और सुकून देती है कि मन के समस्त तनाव दूर हो जाते हैं।
इस ध्यान के लिए ओशो ने जो संगीत बनवाया है, वह पंच धातुओं से बना घंटानाद है। यह घंटानाद तिब्बत में बहुत प्रयोग किया जाता है, इसकी तरंगें शांति और स्वास्थ्य के लिए अति उत्तम होती हैं। इसके बाद मौन बैठकर हथेलियों को गोलाकार भीतर इकट्ठी हुई तरंगों को अस्तित्व में फैलाना होता है और फिर इससे उल्टी गति द्वारा अस्तित्व में बसी तरंगों को भीतर लाना होता है। तीसरे चरण में मौन होकर बैठ जाना है।

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