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धरती से आसमान तक

आधुनिक समय के दो आविष्कारों ने इंसान के एक जगह से दूसरी जगह जाने के तरीकों में क्रांतिकारी बदलाव कर दिया। पहला आविष्कार यांत्रिक शक्ति से चलने वाले वाहन यानी रेलवे इंजन और मोटरकार का है और दूसरा, उड़ने वाली मशीन यानी हवाई जहाज का है। इनके पहले शताब्दियों तक इंसान के सफर करने की गति ज्यादा से ज्यादा उतनी थी, जितनी तेजी से घोड़ा दौड़ सकता था। बाबर ने अपनी आत्मकथा बाबरनामा में बड़ी शान से जिक्र किया है कि कैसे वह लगातार घोड़ा दौड़ाकर दो दिन में दिल्ली से आगरा पहुंच गया था। आज भारी ट्रैफिक जाम का सामना करते हुए भी चार-पांच घंटे में कार से यह सफर तय किया जा सकता है। उसी तरह हवाई जहाज ने एक दिन में एक महाद्वीप से दूसरे महाद्वीप का सफर मुमकिन कर दिया है, जिसमें ज्यादा नहीं, सौ साल पहले तक हफ्तों लग जाते थे। लेकिन इसके आगे भी इंसान की कल्पना के घोड़े दौड़ते रहे। ऐसा वाहन बनाने की धुन लोगों पर सवार हुई, जो सड़क पर दौड़े और आसमान में भी उड़े, यानी ऐसी कार, जो उड़ सके। अब यह खबर आई है कि अगले एकाध साल में ऐसी कार बाजार में आ सकती है। लगभग 1930 से ही ऐसी कार बनाने की कोशिशें जारी थीं, लेकिन अब अमेरिका में एक ऐसी कार बनी है, जो व्यावहारिक रूप से उपयोगी हो सकती है। बनाने वालों ने इसे ‘ट्रांजीशन’ नाम दिया है। यह कार धरती पर लगभग 110-120 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से दौड़ सकती है और आमसान में इसकी गति करीब 180 किलोमीटर प्रति घंटा होगी। यह फिलहाल 1,400 फीट की ऊंचाई तक उड़ सकती है। आम तौर पर बड़े व्यावसायिक हवाई जहाज 35,000 फीट की ऊंचाई पर उड़ते हैं। काफी लोगों ने अभी से इसे बुक करवाना शुरू कर दिया है, हालांकि यह काफी महंगी है। भारतीय मुद्रा में यह करीब एक करोड़ चालीस लाख रुपये की पड़ेगी। यह हमारी कल्पना की उड़न कार जैसी भी नहीं है कि ट्रैफिक जाम में फंसे, तो हवा में उड़ गए। इसे उड़ने के लिए बाकायदा रनवे की जरूरत होगी। लेकिन बात यहां तक पहुंची है, तो आगे भी दूर तलक जाएगी।

बीसवीं शताब्दी की शुरुआत में राइट बंधुओं ने ऐसे हवाई जहाज बनाए, जिन्हें स्थिर रखने या मोड़ने के यंत्र पायलट के हाथ में होते थे। इनके पहले जो उड़ने वाले यंत्र थे, उनकी दिक्कत यह थी कि उनका ठीक से नियंत्रण पायलट के बस में नहीं होता था। राइट बंधुओं की सफलता नियंत्रित उड़ानों वाले हवाई जहाज बनाने में थी। 1901-02 के आसपास उनकी जो सफल उड़ाने थीं, वे लगभग 50 मीटर तक थीं, लेकिन पहले महायुद्ध तक ऐसे हवाई जहाज बन गए थे, जिनका इस्तेमाल युद्ध में किया जा सकता था। नई धातुओं या धातुओं के मिश्रण ने हल्का, लेकिन मजबूत ढांचा बनाना आसान कर दिया है। इसी वजह से हवाई जहाज उड़ाने के लिए जितने शक्तिशाली इंजनों की जरूरत है, उनका वजन भी कम किया जा सकता है। इस कार में जो पंख लगे हैं, वे जमीन पर चलते समय मुड़कर कार के ढांचें से लगभग चिपक जाएंगे और जब हवा में उड़ना हो, तो उन्हें फैलाया जा सकता है। ग्रीक पुराकथाओं में डिडेलस की कहानी आती है, जिसने मोम के पंख लगाकर उड़ने की कोशिश की थी। कहानी यह है कि धूप से उसके पंख पिघल गए और वह पहाड़ी से गिरकर मर गया। डिडेलस की कल्पना को साकार होने में सदियां लग गईं, लेकिन आधुनिक इंसान की उड़न कार बस अब आने को ही है और हमें लगता है जल्दी ही उसके सस्ते और बेहतर मॉडल भी आएंगे। कल्पना को यथार्थ के पंख मिलने में इन दिनों देर थोड़े ही लगती है।

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