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निवेश की मुश्किलें

अफगानिस्तान को ज्यादा से ज्यादा विदेशी और घरेलू निवेश की दरकार है, लेकिन आंकड़े बताते हैं कि निवेश में कमी आई है। अफगानिस्तान एक ऐसा मुल्क है, जहां हर क्षेत्र में निवेश को अहम माना जा रहा है। परंतु मुल्क के लगातार बिगड़ते हालात की वजह से निवेश घटता ही जा रहा है। और भी वजहें हैं, जिन्हें दूर किया जा सकता है। हम जानते हैं कि मुल्क की सुरक्षा स्थिति हुकूमत की मजबूती पर निर्भर करती है। हालांकि अंतरराष्ट्रीय फौजों की वापसी की योजना और सुलह कार्यक्रमों के जरिये अफगानिस्तान में शांति बहाल करने की हर मुमकिन कोशिश की गई, पर दस वर्षों की कोशिशें अब खतरे में है। जाहिर है, इससे निवेशकों की चिंता बढ़ गई है। उनके लिए अफगानिस्तान में निवेश करना सबसे बड़ा जोखिम हो गया है। ऐसे में, इसकी आर्थिक तरक्की का ख्वाब कहीं अधूरा ही न रह जाए। हालांकि माइनिंग के क्षेत्र में उम्मीद की किरणें अब भी दिख रही हैं। अंदाजन, अफगानिस्तान के कुदरती खजानों की कीमत एक से तीन ट्रिलियन डॉलर होगी। दरअसल, तीस से ज्यादा वर्षों से जारी जंगी माहौल में कुदरती खजानों की अहमियत का अंदाजा ही नहीं लग पाया। बहरहाल, करजई हुकूमत ने माइनिंग के ठेके की इजाजत दे दी है। लोगार की खानों से कॉपर और बामियान से लौह अयस्क निकाले जाएंगे। लेकिन क्या ये कदम कामयाब होंगे? जब तक मुल्क के हालात ठीक नहीं होते, कुछ भी कयास लगाना ठीक नहीं। फिलहाल अफगानिस्तान विदेशी मदद के भरोसे ही है। हालांकि ये मदद भी अस्थायी हैं। इसलिए इस अर्थव्यवस्था को लेकर मुल्क के अंदर अस्थिरता का माहौल है। निवेशकों का भरोसा डिगा हुआ है। विदेशी निवेशकों के लिए अफगानिस्तान एक आकर्षक बाजार कैसे हो सकता है? तालिबानी हुकूमत के खत्म होने के बाद कारोबार को बढ़ावा देने की कोशिशें हुईं, लेकिन हिंसा, कत्लेआम, बम धमाकों और धमकियों से हालात बेहतर नहीं हुए। एक मसला और भी है। जब तक खुद अफगानी लोग मुल्क में निवेश नहीं करते हैं, तब तक विदेशियों से किसी तरह की उम्मीद बेमानी ही है।
डेली आउटलुक, अफगानिस्तान

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