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पद का दुरुपयोग

देश के ज्यादातर राज्यों में जमीन के आबंटन को लेकर जो खुलासे हो रहे हैं, उनमें एक बात सभी जगह देखने को मिल रही है कि संबंधित राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने विवेकाधीन कोटे से जुड़े अधिकारों का दुरुपयोग किया। अब समय आ गया है कि ऐसे सभी कोटे खत्म किए जाएं या फिर इन्हें व्यक्ति विशेष तक सीमित न रखकर एक टीम के हवाले किया जाए।
युधिष्ठिर लाल कक्कड़, गुड़गांव, हरियाणा

आत्ममंथन करें अन्ना
अन्ना का आंदोलन एक बार फिर विफल हो गया। आखिर, ऐसा क्यों हुआ? बेहतर होता कि अन्ना हजारे इस पर खुद ही विचार करते। दरअसल, सरकार की मुखालफत का हक हमें है। संविधान ने हमें अभिव्यक्ति की आजादी दी है। लोग जब चाहें, सांसद, विधायक व दूसरे जन-प्रतिनिधियों का विरोध कर सकते हैं। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि हम बेलगाम हो जाएं और शिष्टाचार भूलकर जन-प्रतिनिधियों को गाली देने लगें। भारतीय संस्कृति कभी इसकी इजाजत नहीं देती। अन्ना की मांगें सही थीं, पर उनका तरीका गलत रहा। जिस तरह से मंत्रियों, सांसदों पर लगातार निजी हमले हुए, वे देश के ज्यादातर लोगों को पसंद नहीं आए। यदि टीम अन्ना के लोग वाकई भ्रष्टाचार मिटाना चाहते हैं, तो वे राजनीति की मुख्यधारा में आएं और भ्रष्ट जन-प्रतिनिधियों को हराकर एक मिसाल कायम करें। यह काफी मुश्किल नहीं है, क्योंकि टीम अन्ना को व्यापक जन-समर्थन प्राप्त है। टीम अन्ना का कहना है कि सरकार संसद में जन-लोकपाल विधेयक नहीं पारित कराती है, तो वह अगले चुनाव में सरकार के खिलाफ प्रचार करेगी। इस तरह के कदम से टीम अन्ना की ही फजीहत होगी। अत: वक्त आ गया है कि अन्ना हजारे अपनी नाकामियों की वजह तलाशने के लिए आत्ममंथन करें।
कमलेश तुली, द्वारका, नई दिल्ली

औरतों की घटती आबादी
देश में स्त्री-पुरुष अनुपात में असंतुलन गंभीर चिंता का विषय बन गया है। जाहिर है, इसका मुख्य कारण कन्या भ्रूण हत्या है। लिंग परीक्षण करने वाले डॉक्टरों के खिलाफ लगातार अभियान चलाए जा रहे हैं, मगर कोई फर्क नहीं पड़ रहा है। वैसे, इस कुरीति को बढ़ाने में डॉक्टर तो दोषी हैं ही, पर इस अपराध के लिए हमारा समाज सबसे बड़ा दोषी है। समाज में आज के दौर में भी लड़कियों के साथ भेदभाव हो रहा है। बहुत कम ही ऐसे घर हैं, जहां बच्चियों के जन्म पर खुशियां मनाई जाती हैं। बहुत कम ही ऐसे पिता हैं, जिन्हें बेटे से ज्यादा बेटी की लालसा रहती है। इन्हीं कारणों से कन्या भ्रूण हत्या को बढ़ावा मिला है। मेरी राय में कन्या भ्रूण हत्या आज के दौर की सबसे बड़ी सामाजिक बुराई है। इसके खिलाफ ठोस कदम उठाने ही होंगे, समाज को भी और सरकार को भी।
जशोदा मोनिका गर्ग, केरू, जोधपुर, राजस्थान

कम पड़ती किताबें
हर वर्ष शिक्षा सत्र शुरू होने के बाद भी बाजार में एनसीईआरटी की नई पुस्तकें उपलब्ध नहीं हो पातीं। विद्यार्थियों को काफी भटकना पड़ता है। इस समस्या से काफी हद तक निपटा जा सकता है। अगर हम किताबें संभालकर रखें, तो वे तीन सत्रों तक काम आ सकती हैं। यानी छात्रों को पुरानी पुस्तकें उपलब्ध कराई जा सकती हैं। अंदाजन, करीब दस प्रतिशत बच्चे पुरानी किताबें रद्दी में बेच देते हैं, पचास प्रतिशत कम दाम पर उन्हें बेच देते हैं। शेष चालीस प्रतिशत अपने जूनियर छात्रों को ये किताबें दे देते हैं। यदि हम ऐसी व्यवस्था बना सकें कि पुरानी किताबों को स्कूल ही विद्यार्थियों से ले लें और नए बच्चों को मुहैया कराएं, तो किताबों की कमी भी दूर हो सकती है और पर्यावरण का भी भला होगा।
एचबी शर्मा, जनकपुरी, नई दिल्ली

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