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घाघ की कहावतों का विज्ञान भी मुरीद

‘दिन में गर्मी, रात में ओस। कहे घाघ, वर्षा सौ कोस।’ और ‘बयार चले ईशाना (ईशान कोण), ऊंची खेती करो किसाना।’ सुखाड़ और बाढ़ की आशंका जताने वाले ये सूत्र वाक्य किसी वैज्ञानिक शोध के नतीजे नहीं हैं। किसानों के अनुभवों पर बनी ये वह कहावतें है जो वर्षो से खेती-किसानी का आधार रही हैं, जिनके सार्थकता को वैज्ञानिक भी नहीं झुठला पाए हैं। अब सरकार ने घाघ और भड्डरी के ऐसे ही अनुभवों को पुस्तक में समेट लिया है।

आधुनिक विज्ञान पर खेती के पारंपरिक ज्ञान का लेप चढ़ा कर बनी यह पुस्तक किसानी से जुड़ी नई पीढ़ी को सरकारी तोहफा है। इस प्रयास का फामरूला है नया विज्ञान + पारंपरिक ज्ञान = आधुनिक किसान।

राज्य की खेती आज भी मानसून तथा मौसम के बदलाव पर ही निर्भर है। ऐसे में मौसम के पूर्वानुमान और नक्षत्रों पर आधारित बनी कहावतें भी उतनी ही प्रासंगिक हैं। लेकिन खेती से जुड़ रही नई पीढ़ी को ये कहावतें अब याद नहीं रही।

लिहाजा सरकार ने महाकवि घाघ और भड्डरी के अलावा दूसरे कृषि आचार्यो की कहावतें और लोकोक्तियों को एक पुस्तक में समेट दिया है। बिहार कृषि विश्वद्यालय साबौर द्वारा प्रकाशित इस पुस्तक का लोकार्पण मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने शताब्दी दिवस समारोह में किया था।

पुस्तक में हर फसल और मौसम से जुड़ी कहावतों के लिए अलग चैप्टर है। खास बात यह है कि हर चैप्टर के बीच में वैज्ञानिकों की सलाह को भी जगह दी गई है। कृषि विश्वविद्यालय द्वारा ईजाद नए प्रभेद, सिंचाई और जुताई की तकनीक और यहां तक कि राशि व नक्षत्रों के शुरू होने की संभावित अंग्रेजी तरीखों की जानकारी भी पुस्तक में है। विश्वविद्यालय के प्रसार शिक्षा निदेशक डा. आरके सोहाने ने बताया कि किसानों के लिए यह उपयोगी पुस्तक विभाग के मेलों में बांटी जाती है।

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