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बदहाल जीवन गुजार रहे टाना भगतों के वंशज

रांची में 34वें राष्ट्रीय खेलों के आयोजन के समय बने स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स में एक इंडोर स्टेडियम आजादी के मतवाले टाना भगतों के नाम पर है। लेकिन आज उन्हीं टाना भगतों के वंशज बदहाल हैं। उनकी उपेक्षा का आलम यह है कि कभी टाना भगत के लिए विख्यात लातेहार के चंदवा प्रखंड की निंद्रा पंचायत का अस्तित्व खत्म हो गया है।

महात्मा गांधी के रास्ते पर चलते हुए आजादी की लड़ाई में सर्वस्व न्योछावर कर देने वाले टाना भगतों का आज वजूद ही खतरे में है। आजादी की लड़ाई में सक्रिय रहे थोलवा टाना भगत के पुत्र महादेव कहते हैं, ‘हमारे घर की महिलाएं लाल रंग होने के कारण सिंदूर तक नहीं लगाती हैं लेकिन अब पुलिस हमें नक्सली बताकर मार रही है।’

उन्होंने आरोप लगाया कि उनके नाती को पुलिस ने नक्सली बताकर गोली मार दी। महादेव को अपने पूर्वजों के त्याग और बलिदान पर तो गर्व है पर सरकारी उपेक्षा का दर्द भी उन्हें सालता है ।

सुविधाविहीन कृषि ने बदरंग की जिंदगी
सिंचाई की सुविधा और उर्वरकों की आपूर्ति नहीं होने से खेतीबारी में लगे टाना भगतों की जिंदगी को बदरंग हो गई है। गरीबी, बेरोजगारी और अशिक्षा के कारण टाना भगतों की जिंदगी बदहाल हो गई।

प्रथम राष्ट्रपति भी थे टाना भगतों के कायल
देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉक्टी राजेंद्र प्रसाद भी आजादी के दीवाने टाना भगतों के कायल थे। 1955 में वह निंद्रा पंचायत में आकर स्वतंत्रता सेनानियों से मिले थे। इन्हीं को समर्पित करते हुए निंद्रा पंचायत और रेलवे स्टेशन का नामकरण किया गया। इसमें पंचायत तो समाप्त हो गई आज सिर्फ स्टेशन बचा हुआ है।

निंद्रा पंचायत था नौ टाना भगतों को बसेरा
अंग्रेजों की गुलामी के विरोध में भोला टाना भगत, शनि टाना भगत, थोलवा टाना भगत, एतवा टाना भगत, विरसा टाना भगत, ढिबरा टाना भगत, साधु टाना भगत, मकु टाना भगत तथा छोटया टाना भगत ने चंदवा प्रखंड मुख्यालय पर 1942 में तिरंगा लहराया था। इस मामले में इनके घर, हल, बैल, खेत की कुर्की करते हुए 26-26 रुपए का जुर्माना भी लगाया था। बाद में इन्हें पटना जेल भेज दिया गया। जेल में ही शनि टाना भगत की मौत हो गई थी।

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