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पोंटी चड्ढा की कंपनी के 50 करोड़ रुपए जब्त

 ग्रेटर नोएडा/सत्यवीर नागर

रियल एस्टेट कारोबारी पोंटी चड्ढा को यमुना प्राधिकरण ने भी जोर का झटका दिया है। प्राधिकरण ने 4,500 एकड़ की टाउनशिप के लिए जमा कराई गई 50 करोड़ रुपए की रजिस्ट्रेशन मनी जब्त कर ली है। हालांकि, यह फैसला लेने में प्राधिकरण को करीब आठ महीने का वक्त लगा है। बसपा सरकार में कई अफसरों ने कम्पनी को पैसा लौटाने का रास्ता खोजा था, मगर स्कीम की शर्तो को देखते हुए मामले में हाथ डालने की हिम्मत कोई नहीं जुटा सका।

यमुना प्राधिकरण ने यमुना एक्सप्रेस-वे के सहारे मार्च 2011 में 4,500 एकड़ की एक टाउनशिप स्कीम निकाली थी जिसे प्रदेश की सबसे बड़ी टाउनशिप करार दिया जा रहा था। स्कीम के बदले प्राधिकरण को करीब 8,000 करोड़ रुपये मिलने थे। स्कीम के लिए केवल वेव इंफ्रास्टक्चर ने आवेदन किया। इसके लिए कंपनी ने 50 करोड़ रुपए बतौर रजिस्ट्रेशन मनी और 25 लाख रुपए प्रोसेसिंग फीस के तौर पर जमा कराए। कम्पनी को 760 करोड़ रुपये 28 मार्च, 2011 तक देना था, जो नहीं दिया गया। अफसरों ने कम्पनी पर मेहरबानी दिखाते हुए दो माह का समय बढ़ा दिया। लेकिन, जब मई में निर्धारित तिथि आई तो, कम्पनी ने नोएडा के एक बैंक से बने 760 करोड़ रुपये के डिमांड ड्राफ्ट की फोटो कॉपी प्राधिकरण को भेज दी।

साथ ही सवाल भी किया कि प्राधिकरण जमीन पर कम्पनी को कब्जा कब तक देगा? प्राधिकरण ने इसका जबाव देना उचित नहीं समझा और 27 जून, 2011 को स्कीम रद कर दी। इसके बाद कम्पनी 50 करोड़ रुपये लौटाने की मांग करने लगी। जब कैप्टन एसके द्विवेदी प्राधिकरण के मुख्य कार्यपालक अधिकारी तो उन्होंने कंपनी को जवाब भेजा था कि स्कीम की शर्त के मुताबिक निर्धारित तिथि निकलने के बाद रजिस्ट्रेशन मनी नहीं लौटाई जा सकती।

लेकिन, इसके बावजूद भी कई अफसर कंपनी का रुपया वापस लौटाने का रास्ता तलाशने में जुटे रहे। कम्पनी को पैसा जब्त करने संबंधी नोटिस तक नहीं दिया गया। प्रदेश में सत्ता बदलते ही अफसरों की अदला-बदली का दौर शुरू हुआ तो यमुना प्राधिकरण का चार्ज भी ग्रेटर नोएडा के चेयरमैन रमा रमण को सौंप दिया गया। आखिरकार सोमवार को कम्पनी को पैसा जब्त करने का नोटिस भेज दिया गया है। नोटिस में कहा गया है कि स्कीम की शर्तो के मुताबिक रजिस्ट्रेशन मनी के 50 करोड़ और प्रोसेसिंग फीस के 25 लाख रुपए स्वत: ही जब्त माने जाऐंगे। प्राधिकरण के महाप्रबंधक (वित्त) एसआर जैदी ने कम्पनी को नोटिस भेजने की पुष्टि की है।

---भट्टा कांड ने बचाई जमीन 13 मई, 2011 को हुए भट्टा-पारसौल कांड ही 4,500 एकड़ जमीन प्राइवेट कम्पनी के हाथों में नहीं जाने का कारण बना है। इस टाउनशिप के बदले प्राधिकरण को हालांकि 8,000 करोड़ रुपए मिलते लेकिन, कमोबेश इतनी ही रकम प्राधिकरण को जमीन अर्जित करने में चुकानी पड़ती। प्राधिकरण केवल बिचौलिए की भूमिका में रहता। कोष में धन आना मुश्किल था। लेकिन, इसी बीच भटटा-पारसौल कांड हो गया। कम्पनी को लगा कि किसानों से जमीन लेना प्राधिकरण के लिए आसान नहीं रह गया है। लिहाजा उसने हाथ पीछे खींचने में ही भलाई समझी।

तोड़े-मरोड़े गए थे नियम

बीते वर्ष इस स्कीम को लाने में प्राधिकरण के अफसरों ने बेहद जल्दबाजी दिखाई थी। वेव्स जैसी रियल एस्टेट कम्पनी को ही फायदा मिले, कुछ इस तरह की शर्त रखी गईं। इतना ही नहीं मास्टर प्लान में इंडस्ट्रीयल और आईटी सेक्टरों के लिए आरक्षित जमीन को बदलकर रेजीडेंशियल कर दिया गया था।

प्रोमिला शंकर ने की थी आपत्ति प्रदेश की वरिष्ठ प्रशासनिक अफसर प्रोमिला शंकर उन दिनों गाजियाबाद में एनसीआर प्लानिंग बोर्ड की सब डिविजन में तैनात थीं। बदले गए मास्टर प्लान का ड्राफ्ट जब उन तक पहुंचा तो, उन्होंने इसे पास करने से इंकार कर दिया और गम्भीर आपत्तियां भी लगा दीं। बाद में हालांकि सरकार ने उन्हें काफी प्रताडिम्त किया। उन्हीं का फैसला था कि जिसके चलते जमीन का मास्टर प्लान नहीं बदला जा सका।

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