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इन आत्मघाती विवादों को रोकिए

ऐसा लगता है, जैसे फटाफट क्रिकेट और धड़ाधड़ खबरों के इस मौसम में सनसनी हमारी राष्ट्रीय पहचान बन गई है। ऐसी-ऐसी जानकारियां सुर्खियां बन रही हैं, जो चौंकाती और दिल दहलाती हैं। सेना और सरकार के रिश्तों के बीच खटपट की खबरों की दुर्भाग्यपूर्ण श्रृंखला इसका प्रतीक है।

हम हिन्दुस्तानी आजादी के बाद से जिन चुनिंदा तत्वों पर नाज करते रहे हैं, उनमें हमारी सेना भी है। भारतीय सेना अपनी राजनीतिक निस्पृहता के कारण विश्व की सर्वोत्तम सैन्य शक्तियों में गिनी जाती है। सेना में राजनीतिक हस्तक्षेप की खबरें तो आती रही हैं, पर राजनीति में किसी आला सैन्य अधिकारी ने दखल दिया हो, इसका कोई प्रमाण नहीं। दुर्भाग्य से इस परंपरा को तोड़ने की सुनियोजित साजिश की जा रही है। कौन हैं इस षड्यंत्र के वास्तुकार?
 
दिल्ली के सत्ता सदन में चर्चा गरम है। जनरल वी के सिंह और रक्षा मंत्री ए के एंटोनी की जोड़ी एक मामले में लाजवाब रही है। दोनों ही प्रतिबद्ध और ईमानदार हैं। वी के सिंह ने जहां सेना के ढांचे को अंदर से मजबूत करने की कोशिश की, वहीं एंटोनी इस मामले में किसी भी दबाव के आगे झुकने से इनकार करते रहे हैं। पिछले ही महीने उन्होंने विश्व की छह चुनिंदा प्रतिरक्षा साजो-सामान बेचने वाली कंपनियों पर प्रतिबंध लगाया था। कई लोगों को यह फैसला खटक रहा होगा। सवाल उठता है, क्या कुछ लोग सेनाध्यक्ष के उम्र-विवाद की आड़ लेकर दोनों पर निशाना साध रहे हैं? कहने की जरूरत नहीं कि लोकतंत्र में भ्रष्टाचार को सर्वाधिक बढ़ावा देने वाली ये प्रतिरक्षा कंपनियां अपनी जड़ें भारत में भी बहुत गहरे तक फैला चुकी हैं। तो क्या कुछ नौकरशाहों और राजनेताओं का गठबंधन अपने निजी हितों के लिए इस तथाकथित विवाद को तूल दे रहा है?

जनरल वी के सिंह उम्र विवाद को लेकर सर्वोच्च अदालत की शरण में क्या गए, इन लोगों को मौका मिल गया। सबसे पहले सिंह की चिट्ठी ‘लीक’ की गई। इस चिट्ठी में लिखा गया था कि सेना के पास जरूरी साजो-सामान की बेहद कमी है। इसमें अनोखा क्या था? मजबूत सेना शक्तिशाली राष्ट्र की पहचान होती है। सेनाध्यक्ष होने के नाते जनरल वी के सिंह का कर्तव्य है कि वह वास्तविकता से सरकार को रूबरू कराएं। इससे पहले ऐसा होता रहा है, आगे भी होता रहेगा।

लेकिन चिट्ठी ‘लीक’ करने वाले जानते थे कि सर्वोच्च अदालत से मुकदमा वापस लेने के बाद सिंह और सरकार के बीच फिर से तालमेल स्थापित होने के हालात पैदा हो रहे हैं। उन्होंने इसे नष्ट करने के लिए ‘पत्र बम’ का इस्तेमाल किया। परिणाम उम्मीद के अनुरूप रहे। पूरे देश में कयास लगाए जाने लगे कि सेना प्रमुख और सरकार के बीच खटपट यथावत है। लोगों के मन में यह संदेह भी रोपने की कोशिश की गई कि इस चिट्ठी को ‘लीक’ करने के पीछे सेनाध्यक्ष या उनके कुछ करीबी हो सकते हैं। देश की सर्वोच्च खुफिया संस्था आईबी ने इसकी जांच की और शुरुआती दौर में ही इस आशंका को निराधार माना कि यह कुत्सित काम जनरल सिंह या उनके किसी नजदीकी शख्स ने किया है। एक बार फिर देश भर में आश्वस्ति आधार पाने लगी, परंतु षड्यंत्रकारियों के प्रक्षेपास्त्र चुके नहीं थे।

इस बार एक सैनिक अभ्यास को लेकर खबर आई और बिना कहे यह संदेश देने की कोशिश की गई कि सेना ने अपनी मर्यादा को दांव पर लगाया है। कई सवाल उछले, जो जता रहे थे कि दाल में बहुत कुछ काला था। सुकून की बात है कि अपनी तमाम कमजोरियों के बावजूद हम एक परिपक्व लोकतंत्र हैं। शाम होते-होते देश के सामने स्पष्ट हो गया कि किसी ने अनुशासन या परंपरा की हद नहीं तोड़ी थी और मंशा पर सवाल उठाने वाले खुद प्रश्नों के घेरे में आ गए।

मैं यहां पूरी विनम्रता के साथ कहना चाहूंगा कि सेना के कुछ अधिकारियों और सरकार में तकरार कोई नई बात नहीं है। इसे तूल दिया जाना किसी के हित में नहीं है। इससे सिर्फ और सिर्फ अपने देश का नुकसान होना है। मीडिया को भी इस मामले में संयम बरतना चाहिए। हम राष्ट्र निर्माण में सहायक तत्व बने रहें, यह हमारे लिए जरूरी है। अतीत में सेना और सरकार के रिश्तों पर रिपोर्टिग के वक्त इसका ख्याल रखा जाता था।

हम गर्व से याद कर सकते हैं कि 1957 में जब जनरल के एस थिमैया ने सेनाध्यक्ष की कुरसी संभाली थी, तब उन्होंने भी सेना को मजबूत करने की मांग उठाई थी। कृष्ण मेनन उन दिनों रक्षा मंत्री हुआ करते थे और उन्हें प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का जबर्दस्त स्नेह हासिल था। हमें आजाद हुए कुल दस बरस हुए थे और हमारा आदर्शवादी नेतृत्व सोचता था कि एक अमन पसंद देश के लिए फौज बहुत जरूरी नहीं है। इस विचार का ऐतिहासिक आधार था। अंग्रेजों ने भारतीयों के दमन के लिए लंबे समय तक सेना का इस्तेमाल किया था। इसी सोच को लेकर थिमैया और मेनन में तकरार हुई थी, जिसमें नेहरू ने मेनन का साथ दिया। 1962 में चीन से हार के बाद सबकी समझ में आ गया कि यह सोच कितनी कारगर थी! उस समय भी मीडिया ने तमाम सवाल उठाए थे, पर वे राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित थे, न कि दो व्यक्तियों के विवाद से।

बहुत दूर क्यों जाएं? एडमिरल भागवत और तब के रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नाडिस में भी विवाद हुआ था। सरकार चाहती थी कि एडमिरल हरिंदर सिंह को नौसेना का उप प्रमुख बनाया जाए। भागवत इससे इनकार कर रहे थे। प्रधानमंत्री वाजपेयी ने पुरानी परंपराओं का पालन करते हुए रक्षा मंत्री का साथ दिया। देश के इतिहास में पहली बार कोई नौसेना प्रमुख बर्खास्त हुआ, पर उन दिनों भी आज की तरह शोशेबाजी नहीं हुई।

एक बड़े और लोकतांत्रिक देश में बहस-मुबाहिसा जरूर होना चाहिए। कभी-कभी सरकार और राष्ट्र के लिए जरूरी किसी संस्था के बीच कुछ वैचारिक मतभेद भी हो सकते हैं। लोगों की प्राथमिकताएं और विचार भी जुदा हो सकते हैं। अगर हम यह मानकर चलें कि सारे मतभेदों के बावजूद हमें देश के लिए काम करना है, तो परेशानी नहीं होगी, परंतु निजी महत्वाकांक्षाओं के उभार के इस युग में इसकी अनदेखी हो रही है, यह दुखद है।

हमें भूलना नहीं चाहिए। चीन दक्षिण चीन सागर में एक पेट्रोलियम परियोजना के मुद्दे पर हमें आंखें दिखा रहा है। उसने हमारी सीमा तक सड़कें बिछाकर अपनी सैनिक टुकड़ियों के लिए रास्ता सुगम कर दिया है। म्यांमार और नेपाल के बाद अब उसने मालदीव के साथ श्रीलंका पर ध्यान केंद्रित करना शुरू कर दिया है। ऐसे में, बीजिंग में एक वरिष्ठ अधिकारी का यह कहना कि भारत को दक्षिण चीन सागर में दखल पर दुष्परिणाम भोगने होंगे, चौंकने पर विवश करता है। हम एक बार धोखा खा चुके हैं। यह समय सचेत होकर आत्मरक्षा की तैयारी का है, न कि आत्मघाती विवादों का।

उम्मीद है, सरकार और सेना के आला अफसर वक्त की नजाकत को समझेंगे और जरूरी साझा कदम भी उठाएंगे।

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