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राष्ट्रीय सुरक्षा महत्वपूर्ण लेकिन परवाह किसे है

भारत के सामने आज सबसे बड़ा खतरा क्या है?
चीन और पाकिस्तान। दोनों मोर्चो पर सैन्य दबाव बढ़ रहा है। भारत के पास सामरिक हथियारों की कमी है, ऐसा जनरल वी के सिंह कहते हैं। जबकि चीन और पाकिस्तान अपनी फौज को आधुनिक बना रहे हैं? 
मैं परमाणु हथियारों आदि की संख्याओं में नहीं जाना चाहता। हम जो मिसाइल प्रक्षेपण कर रहे हैं, उससे सब साफ हो जाता है। जहां तक पाकिस्तान का मसला है, तो हमारे पास 800 किलोमीटर तक मारक क्षमता की पृथ्वी मिसाइल है। मैं सरकार से यह नहीं पूछ रहा हूं कि क्या उसके पास एनडीए के वक्त के कार्यक्रम हैं? वहीं दूसरी तरफ, हम जानते हैं कि हालात इतने खराब भी नहीं हैं, जैसा थल सेनाध्यक्ष बता रहे हैं। आखिर उन्होंने
ढाई वर्षो तक क्या किया?
क्या हम चीन और पाकिस्तान से एक साथ परंपरागत युद्ध कर पाएंगे?
नहीं, मुझे नहीं लगता कि कोई युद्ध होगा। अगर दोनों देश भारत पर सैन्य दबाव बना रहे हैं, तो इसका मतलब है कि वे भारत को दक्षिण एशिया व दक्षिण-पूर्व एशिया में व्यस्त रखना चाहते हैं। चीनी चाहते हैं कि भारत दक्षिण एशिया से बाहर के मसलों में न पड़े। वे यह भी नहीं चाहते कि दक्षिण चीन सागर में भारत का हस्तक्षेप हो। जब मैं यह कहता हूं कि आने वाले वर्षो में सैन्य दबाव बढ़ेगा, तो इसका मतलब है कि चीन व पाकिस्तान मिलकर दबाव बढ़ा सकते हैं। पाकिस्तान मानता रहा है कि उसके पास हमसे बेहतर फौजी तंत्र है। वह तीन बार इसे साबित करने में नाकाम रहा। लेकिन उसकी कोशिश जारी है। आज जो समस्या हम देख रहे हैं, वह यह है कि फौज, कारोबार व इंफ्रास्ट्रक्चर के क्षेत्र में पाकिस्तान के साथ मिलकर चीन काफी कुछ कर रहा है। वे हर वक्त के दोस्त नहीं, बल्कि सैन्य सहयोगी हैं। अब अगर रक्षा मंत्री व प्रधानमंत्री को लगता है कि स्थिति 1962 से खराब है, तो उन्हें तेजी से कुछ कदम उठाने होंगे। वहीं राजनेताओं को अब बोफोर्स कांड को भूल जाना चाहिए। इसलिए अगर जनरल सिंह तीन-चार या अगले पांच वर्षो में हमारे साथ क्या हो सकता है, उसे बता रहे हैं, तो मैं उनका समर्थन करता हूं।

सेना प्रमुखों की नियुक्ति उम्र व वरिष्ठता के आधार पर होती रही है, न कि योग्यता के आधार पर। क्या इस प्रक्रिया पर विचार जरूरी है?
अपने आप उत्तराधिकारी मिले, यह असंभव है। अगर सेना प्रमुख व वरिष्ठ कमांडर अपने जवानों को नहीं संभाल पाते हैं और जवान इनसे असंतुष्ट हैं, तो वे प्रमुख बनने लायक नहीं हैं। यहां तक कि वे सेना में होने के लायक भी नहीं हैं। कुछ लोग फौज के नैतिक पतन की बात करते हैं। मैं उनसे पूछता हूं कि क्या आप जवानों के बारे में बोल रहे हैं या अपने बारे में। वरिष्ठ अधिकारियों की ही ये शिकायतें हैं। वे उनकी अपनी शिकयतें हैं न कि जवानों की। इसका समाधान तो असैन्य व सैन्य अधिकारियों के बीच आपसी सहयोग से निकलेगा।

जनरल ने ऐसा इसलिए तो नहीं किया कि उन्हें दोबारा मौका नहीं मिल रहा है?
हमारे वक्त में एडमिरल विष्णु भागवत के साथ अनबन हुई थी। यहां इस मसले में जनरल एंटोनी का विरोध नहीं कर रहे हैं। वह तो अपनी जन्मतिथि को लेकर चिंता जता रहे थे। निजी समस्या के तौर पर इसकी शुरुआत हुई और आखिर में सुप्रीम कोर्ट ने उनके मामले को खारिज कर दिया। इसके बाद से वह उत्तेजित हो उठे हैं। कभी यहां हमले कर रहे हैं, तो कभी वहां।

लेकिन यह नहीं लग रहा है कि जनरल की तरफ से चिट्ठी लीक हुई।
उनके पास सिर्फ निजी एजेंडा है। जहां तक चिट्ठी लीक होने का मसला है, तो मैं छह साल तक प्रधानमंत्री कार्यालय में रह चुका हूं। प्रधानमंत्री के पास काफी विश्वस्त लोग होते हैं, जो संवेदनशील दस्तावेजों की हिफाजत करते हैं। मैं इसकी कल्पना भी नहीं कर सकता कि वहां से चिट्ठी लीक की जा सकती है। जनरल कहते हैं कि पाकिस्तान से भिड़ने के लिए हमारे पास कुछ भी नहीं है, तो आपको क्या लगता है कि सिर्फ इसलिए पीएमओ की तरफ से चिट्ठी लीक होगी?  पीएमओ से यह कतई मुमकिन नहीं है।

तो इस मसले का हल क्या है?
सरकार जनरल सिंह को अनिवार्य छुट्टी पर जाने को कहे। अगर वह जाते हैं, तो दो महीने ही बचे हैं उनके रिटायरमेंट में। सरकार दुविधा में है। यह एकदम गैर सरकारी नजरिया है। मध्य वर्ग, यहां तक कि किसान भी महसूस कर रहा है कि देश में कोई सरकार नहीं है। अगर हम बदलाव नहीं चाहते हैं, बल्कि कुछ वर्षो तक हालात सुधारना चाहते हैं, तो सबसे पहले एक मजबूत रक्षा मंत्री चाहिए।

तो आपके मुताबिक मौजूदा रक्षा मंत्री कमजोर हैं?
मैं यह नहीं कह रहा कि एंटोनी मजबूत हैं या नहीं। मैं एंटोनी की आलोचना नहीं कर रहा हूं, न ही किसी राजनेता की। लेकिन अगर वह मजबूत हैं, तो उन्हें दृढ़ता दिखानी होगी। मंत्री आपस में खुलेआम झगड़ रहे हैं। मैंने अब तक इतनी उलझन वाली सरकार नहीं देखी।

अगर तीसरे मोर्चे जैसी सरकार बनती है, तो राष्ट्रीय सुरक्षा के क्या मायने होंगे?
अगर तीन महिला शक्ति और मुलायम व चंद्रबाबू नायडू मिलकर तीसरा मोर्चा बनाते हैं, तब भी उस गठबंधन को बहुमत नहीं मिलेगा। कांग्रेस या बीजेपी के ही सबसे ज्यादा सांसद होंगे। वे सरकार में शामिल नहीं होंगे। फिर अगले 12 से 18 महीने में अगला चुनाव होगा। वैसे राष्ट्रीय सुरक्षा की परवाह किसे है? जबकि यह काफी महत्वपूर्ण है। आपकी तैयारी पूरी है, तो पड़ोसी देश से भी इज्जत मिलती है।

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