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एक पुष्प की चाह!

कभी एक पुष्प की चाह रही कि उसे सुरबाला के गहनों में न गूंथा जाए। पुष्प ने यह भी कहा कि देवता के शीश पर चढ़ने का भी उसे कोई शौक नहीं। पुष्प फ्रीडम फाइटर था। अपने वनमाली से इतनी भर विनती की कि हे वनमाली, मुङो तोड़कर उस ‘पथ’ पर फेंक देना, जिससे मातृभूमि पर शीश चढ़ाने वीर आते रहते हैं।

वे दिन ऐसे थे। वीरों की फसलें उगा करती थीं। पुष्प बरसते रहे कि हम किस वीर के शीश पर चढ़ें। चढ़ाने वाले से प्रार्थना करते- हे वीर पूजक, जरा इस बांके वीर के शीष पर शोभित कर दो। थैंक्यू। इतिहास ने पुष्प की चाह पूरी नहीं की ऐसा प्रतीत होता है। यह पुष्प आज तक भटक रहा है और भटककर साहित्य की गंदी गलियों में आ गया है और इधर के बंदों ने उसे ‘पुष्प गुच्छ’ बना डाला है।

वह अपने इस साहित्यिक नामकरण से परेशान है, ‘यार, यह सजा मैंने कब मांगी थी?’ उर्दू में ‘गुलदस्ते’ को छोड़ शुद्ध हिंदी में ‘पुष्प गुच्छ’ चला डाला। पुष्प के साथ ‘गुच्छ’ को मिलाकर पुष्प के सौंदर्य को ही नष्ट कर दिया है। एक दिन पुष्प ने अपना दर्द कहा। मैंने कहा- भैये! तू ‘फूलों’ के बीच फंस गया है। इन्हें ‘फूल’ और ‘फूल’ में भेद करना नहीं आता। ‘फूल’ को ‘फूल’ समझते हैं और कहते हैं कि कविता की है। तुङो गुच्छ में ‘तुच्छ’ बना डाला न। और ‘चाह’ कर ले। कविवर बिहारी ने तेरे जैसों के लिए बहुत पहले यह दोहा लिख छोड़ा है- वे न यहां नागर बड़े, जे आदर ते आव! फूल्यो अनफूल्यो रह्यो, गंवई गांव गुलाब।

पुष्प बोला- ‘गुच्छ’ बनाकर ‘टुच्चों’ ने मुङो भी ‘टुच्च’ बना डाला है। पता नहीं, कहां-कहां की घास-फूस, नकली रंग डालकर ससुरे केमिकल वाली खुशबू मार देते हैं। बदबू के मारे बुरी हालत होती है मेरी। ये बताओ भाई कि आखिर साहित्य में इतनी बदबू क्यों है? क्या साहित्यकार नहाते नहीं? हाथ-मुंह नहीं धोते?

मैं बोला- तू नहीं समझेगा बावले। इन दिनों असली ‘वीर’ ये लोग ही हैं। वे तुङो स्वीकार कर लेते हैं, यही क्या कम गनीमत है! वरना इन दिनों तो ये नोटों की माला ‘प्रेफर’ करते हैं।

अब पुष्प के लिए हर शाम तकलीफदेह है। वह अध्यक्ष महक रहा है, लेकिन क्या करे प्लास्टिक के रैपर में बंद ‘पुष्प’ साहित्य की ‘कार्बन डाईऑक्साइड’ ङोले जा रहा है, जिसमें जर्दे की तीखी दरुगध मिली है। पुष्प को उल्टी होने को आती है। आशीर्वचनों के बाद अध्यक्ष लपक कर गाड़ी की ओर आते हैं, तो ड्राइवर दौड़कर पुष्प गुच्छ को गाड़ी के पीछे ऐसे पटक देता है, जैसे हिंदी साहित्य के इतिहास को ‘पिछवाड़े’ फेंक रहा हो।

अध्यक्ष ये जा वो जा। ड्राइवर रात के ग्यारह बजे साहित्य को कोसता हुआ लास्ट मेट्रो की ओर लपकता है। उधर पुष्प गुच्छ गाड़ी में बंद-बंद गमकता रहता है। अगली सुबह गाड़ी साफ   करने वाला मुरुगन पुष्प गुच्छ को कूड़े के ढेर में फेंक देता है।

एक पुष्प की चाह का अंत ऐसा ही होता है। गलती पुष्प की ‘चाह’ में निहित थी। ‘पुष्प’ जब तक ‘पुष्प’ रहा, वह कवियों की कविता में ‘उपमान’ बनकर छाया रहा। जब से पुष्प ने ‘उपमेय’ बनने की ठानी, तभी से उसका पतन हो गया। खासकर हिंदी कविता में अब ‘पुष्प’ नहीं होते, ‘पटाखे’ होते हैं। कवियों को फूलों के नाम तक नहीं मालूम। वे ‘बेला’ और ‘जूही’ और ‘मालती’ में फर्क नहीं जानते। कविता करते हैं।

इसलिए हिंदी के शुद्धीकरण के हिमायतियों से पूछता हूं, इन्हें ‘गुलदस्ता’ कह दोगे, तो क्या फूल फूल नहीं रहेंगे?

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