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एहसास के कई रंग

अक़ील नोमानी ने किताब में लिखी एक भूमिका में कहा है कि एहसास में शिद्दत, जज्बात में पाकीज़गी, ज़हन में उजाला, आंखों में ख्वाबों का सरमाया और साथ में अल्फ़ाज़ो-मआनी की कायनात और एक अज़ीम मक़सदे-हयात हो तो ऐसे शख्स को शायर कहलाने का पूरा हक़ है। शायर पवन कुमार की गज़लों-नजमों से सजी इस किताब के अशआर अपने लब्बोलुआब में इन अल्फ़ाजों के पैराए में पूरा उतरने की ईमानदार कोशिश में मुब्तिला दिखते हैं। ग़ज़ल की मौजूदा दशा-दिशा आज अपने पूरे शबाब पर बेशक न हो, लेकिन नई उम्र के कुछ शायर इसकी पाकीज़गी को समझ रहे हैं और अपने-अपने तरीके से अदब की खिदमत में शिद्दत से लगे हैं। प्रस्तुत ग़ज़ल संग्रह से होते हुए शायर पवन कुमार के बारे में भी कुछ ऐसे ही विचार मन में उठते हैं।

संग्रह की ग़ज़लों में शायर की सोच का दायरा निजता और सामाजिकता के फैलाव को पूरी तरह से अपने में समेटने को बेचैन दिखता है। शायर खुद को कायनात के केंद्र में नहीं रखता, बल्कि एक र्जे की मानिंद दुनिया के थपेड़े खाते हुए सीखने की जुस्तजू में बेचैन है : एक एहसास कुछ मुख्तलिफ़ सा रहा/सर को पत्थर के साथ आजमाते हुए। इसके साथ ही शायर की बेचैनी नित-नए रंग बदलती दिखती है। वो अगर एक जगह जिंदगी की जद्दोजेहद के सामने हिम्मत से डटा खड़ा है : तेरे हर नक्श को दिल से जिया है/तुझे ऐ ज़िंदगी ढोया नहीं है- न जाने उसको कितने ग़म मिले हैं/हुई मुद्दत कि वो रोया नहीं है, तो दूसरी तरफ बेहद निजी लम्हात के एहसास भी बहुत शाइस्तगी से पेश करता है: हर इक उम्मीद कल पर टल रही है/हमारी ज़िंदगी बस चल रही है या फिर इसे तो जीतना था नफरतों को/मुहब्बत हाथ कैसे मल रही है।

ग़ज़ल मूलत: उर्दू की विधा है। इस मुद्दे पर एक अरसे तक बहस बहुत लंबी चलती दिखी थी। हिन्दी में ग़ज़ल को खासी इज्जत मिली, लेकिन उर्दू के अदीबों ने फिर भी इसकी बुनियाद उर्दू-फारसी की जमीन को ही माना। शायर पवन कुमार उर्दू अदब के नजदीक हैं और उनके ग़ज़ल कहने के एहसास काफी हद तक पूर्ववर्ती शायरों से प्रेरित नजर आते हैं। इसी कारण वह अपनी सोच और फिक्र में मौलिक होते हुए भी एक लंबी रिवायत से जुड़े हैं, जो कुदरती है। दरअसल, इस परंपरा के असर में आने से बचा भी नहीं जा सकता, और यहां शायर शुरुआत में अपने ऊपर इस असर की बात भी करता है। यह उर्दू और फारसी अदब की रिवायत पसंदगी ही थी जिसने ग़ज़ल को एक अज़ीम ऊंचाई दी थी और उसका जो खास-उल-खास दर्जा सत्रहवीं सदी में बना था, वो आज तक जारी है।

इसके अलावा, ग़ज़ल रूमानियत भी है और अविभाजित हिन्दुस्तान में इसका एक तरक्की पसंद रूप भी बीसवीं सदी में सामने आया था। कदम-दर-कदम पवन कुमार अपने शेरो-सुखन में इस रूप की भी पैरवी करते हैं। वह शास्त्रीयता के खिलाफ नहीं हैं और प्रगतिशीलता की गोद में भी नहीं बैठे हैं, बानगी पेश है : जिस्म के ज़ख्म सारे दिखते हैं/रूह पर इक लिबास बाकी है। इन ग़ज़लों की एक खास बात यह भी है कि ये इनसान के इश्के-हक़ीक़ी और इश्के-मजाज़ी दोनों ही रूपों पर भी बात करने की हिम्मत करती हैं। बहुत बेख़ौफ होकर फूल जो सहरा में उगता था/ बदलते वक्त में वो भी ख़ुदा से बाग़वां चाहे। एक और जगह वो कहते हैं: अम्न वालों की इस क़वायद पर/सुनते हैं ‘बुद्ध मुस्कुराए हैं’ और अब ये आवारगी का आलम है/पांव अपने सफ़र पराए हैं। इसी तरह कुछ स्थानों पर शायर इनसानी वजूद से जुड़ी पहेलियों पर हैरानी जाहिर करते हुए कहता है, मिरी तन्हाई क्यों अपनी नहीं है/ये गुत्थी आज तक सुलझी नहीं है।

इनसान इनसान से कभी विमुख नहीं हो सकता। इनसानियत इनसान के वजूद का एक अटूट अंश है और इश्क उसकी बुनियादी जरूरत। इस हकीकत को जब तब चोट भी पहुंचती है : कहने को इंसान बहुत हैं/पर इसमें बेजान बहुत हैं, शायर आगे कहता है- इश्क ही नेमत इश्क़ खुदाई/पर इसमें नुक़सान बहुत हैं। इसी बेचैनी से जूझते हुए शायर आखिरकार रोजमर्रा के जीवन के बेतरतीब रूप को ही अपनी पसंद के केंद्र में रखता है : बेतरतीब सा घर ही अच्छा लगता है /बच्चों को चुपचाप बिठा के देख लिया।

तो ‘वाबस्ता’ किसके, कारण साफ है! ये ग़ज़लें हैं इनसान से वाबस्ता, उसकी कमी और खूबियों के नाम, उसकी तंगदिली को माफ करते हुए उसकी फ़राख.दिली को नज़र, उसके रूहानी रूप की तलाश में और तरक्की पसंदगी के चश्मे पर पड़ी धूल हटाते हुए, उसकी दुनियावी बेचैनियों से रूबरू और उसके खुदाई प्रेम के नाम, इश्क के नाम, उसकी पाकीज़गी के नाम, यानी सिर्फ इनसान के नाम : एक से खांचे सांचे में सब ढलते हैं/फिर ये मज़हब, ज़ात घराना आखिर क्यों। शायर पवन कुमार के अल्फ़ाज़ों ने अभी रफ्तार पकड़ी भर है।

वाबस्ता (ग़ज़लें/नज्में), शायर : पवन कुमार, प्रकाशक: प्रकाशन संस्थान, 4268-बी/3, अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली-110002, मूल्य: 200 रु.

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