DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

लापरवाही के हथियार

सेना को लेकर जो विवाद चल रहे हैं, उनमें एक नया मोड़ सीएजी की रपट ने जोड़ा है। यह रपट अभी नहीं आई है, बल्कि दिसंबर में ही सीएजी ने यह रिपोर्ट जमा कर दी थी। रिपोर्ट ज्यादा विस्तार में वही बातें कहती है,जो थल सेनाध्यक्ष वी के सिंह ने प्रधानमंत्री को लिखे गोपनीय पत्र में बताई थीं और जिसके लीक होने पर हंगामा हुआ था।

इस रिपोर्ट का भी मूल मुद्दा यही है कि हथियारों और सैन्य उपकरणों के मामले में सेना की स्थिति अच्छी नहीं है। उसके पास जो तोपें हैं, वे दूसरे विश्व युद्ध से लेकर सत्तर के दशक की टेक्नोलॉजी पर आधारित हैं। हथियारों और साजो-सामान की खरीद में अक्सर बहुत देर हो जाती है और उसमें सुचिंतित दृष्टिकोण भी नहीं दिखता। यह अजीब बात है कि सीएजी की इस रिपोर्ट पर कोई चर्चा नहीं हुई, यहां तक कि भाजपा सांसद मुरली मनोहर जोशी के नेतृत्व वाली लोक-लेखा समिति ने भी इसे गंभीरता से नहीं लिया।

यह कहा जा सकता है कि थल सेनाध्यक्ष ने कोई नई बात नहीं कही और सीएजी ने भी जो कुछ कहा है, वह भी कोई छिपी हुई बात नहीं है। यह बहुत जानी-मानी बात है कि रक्षा सामग्री की खरीद में जितनी बाधाएं आती हैं और जितनी गड़बड़ियां होती हैं, उनसे अक्सर यही होता है कि जिस उद्देश्य से खरीद की योजना बनाई जाती है, वही उद्देश्य पूरा नहीं होता।

बोफोर्स तोप के विवाद ने जो भी भूमिका भारतीय राजनीति में निभाई हो, लेकिन उसके बाद तो हर रक्षा सौदा विवादास्पद बन गया। इन विवादों से भ्रष्टाचार कितना कम हुआ, यह बताना मुश्किल है, अलबत्ता सेना के लिए साजो-सामान खरीदने की राह बहुत कठिन हो गई। इस वजह से न तो आज की सुरक्षा जरूरतें पूरी होती हैं, न ही दस साल बाद की, क्योंकि तब तक टेक्नोलॉजी आगे बढ़ जाती है और रक्षा की जरूरतें और प्राथमिकताएं बदल जाती हैं।

बोफोर्स तोपें आज भी हमारी सेना के लिए सबसे जरूरी हथियारों में से एक हैं, कारगिल युद्ध में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। अब हमें ज्यादा तोपों की जरूरत है, उन्हें बनाने की टेक्नोलॉजी भी हमारे पास आ गई है, लेकिन बोफोर्स ऐसा नाम है, जिसके सामने आते ही विवाद खड़ा हो जाता है। बोफोर्स कंपनी हमारे यहां ब्लैक लिस्टेड है और इस ब्लैक लिस्ट के चलते ही हमें तोपों के लिए गोला-बारूद की कमी पड़ रही है।

यह खुश होने की बात नहीं है कि हम इस वक्त दुनिया में हथियारों के सबसे बड़े खरीदार हैं। इससे यही पता चलता है कि आजादी के 65 साल बाद भी हम हथियारों के मामले में पूरी तरह से दूसरे देशों पर निर्भर हैं। डीआरडीओ जैसे संगठन आमतौर पर बेकार ही सिद्ध हुए हैं और हमारे रक्षा कारखाने जो पिस्तौलें या बंदूकें बनाते हैं, वे भी अंतरराष्ट्रीय स्तर की नहीं हैं। बोफोर्स विवाद के बाद रक्षा खरीद से दलालों को बाहर रखने का जो फैसला हुआ है, उससे नुकसान ज्यादा हुआ।

पहले रक्षा खरीद में आधिकारिक रूप से बिचौलिए शामिल होते थे, अब भूमिगत और चोरी-छिपे काम करने वाले दलालों की बन आई है, जिससे रक्षा सौदों में गड़बड़ियों की आशंका बढ़ गई है। जटिल नियमों और अविश्वास की वजह से कई नामी रक्षा कंपनियां ब्लैक लिस्टेड हो गई हैं और इससे भी रक्षा सामग्री की खरीद में समस्या आने लगी है। अब भी वक्त है कि भारत  में निजी क्षेत्र को शामिल करके हथियारों के मामले में स्वावलंबी बनने की तेज मुहिम चलाई जाए। इससे कई अन्य फायदे तो होंगे ही, हमारी सेना को अपनी जरूरत के मुताबिक हथियार भी मिलने लगेंगे। यह जरूरी है कि सैनिक और असैनिक नौकरशाही के बीच संदेह और प्रतिस्पर्धा का माहौल खत्म हो ओर ये मिल-जुलकर काम करें।

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:लापरवाही के हथियार