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अब तो बंद कर दो फांसी की सजा

जुर्म के लिहाज से ही सजा मिलनी चाहिए। यही इंसाफ की बुनियाद है। लेकिन इसी बिना पर क्या एक हत्यारे  को फांसी देना जरूरी है? इस मसले पर मेरा जवाब है- नहीं, बिल्कुल नहीं। अपने  देश को तो जल्द से जल्द इसे खत्म कर देना चाहिए।
 
महात्मा गांधी के जन्मदिन या पुण्यतिथि पर यह फैसला ले लेना चाहिए। पश्चिम में कई देशों ने इससे निजात पा ली है। अमेरिका में भी कई राज्यों ने उसे खत्म कर दिया है। लेकिन कई राज्यों ने उसे नहीं हटाया है। वहां पर कई तरह से मौत की सजा दी जाती है। उनमें सबसे ज्यादा इस्तेमाल इलेक्ट्रिक चेयर का होता है। अरब में तो कई जगह सिर कलम   कर देना या पत्थर से मारना जैसे बर्बर तरीके चल रहे हैं।

हमें सजा देने के अपने तरीके में बदलाव करना चाहिए। मौत की सजा को तो खत्म ही कर देना चाहिए। अब दूसरे लोगों की जान लेने वालों को दंडित करने के लिए कुछ और सजा ढूंढ़नी चाहिए। वह क्या हो? उसके लिए समाज में बहस होनी चाहिए। मीडिया और अपने सांसदों-विधायकों को उस पर बात करनी चाहिए।

एक सजा के बारे में तो मेरे मन में कोई उलझन नहीं है। वह सजा बलात्कारी के लिए है। बलात्कारी को तो हर हाल में बधिया कर देना चाहिए। महज ऐलान कर देने से ही बलात्कार के मामलों में जबर्दस्त फर्क आएगा। बलात्कारी को सालों-साल जेल में रखना बेकार है।

कुछ ऐसे अपराध हैं, जिनमें जुर्माना लगाकर ही काम चलाया जा सकता है। कुछ में जेल की हवा खिलाई जा सकती है। एक मामला, जिससे हम सबसे ज्यादा परेशान हैं, वह भ्रष्टाचार का है। भ्रष्टाचार जितना ऊपर के स्तर पर होगा, उतना ही ज्यादा पैसा उससे जुड़ा होगा। आजकल एक-दो करोड़ तो मामूली रकम मानी जाती है। काला धन तेजी से बढ़ता जा रहा है। भ्रष्ट पैसे वाले आसानी से वकील कर लेते हैं। ऐसे लोग आसानी से जजों की जेबें भर सकते हैं।

अब ऐसे लोगों पर लंबा मुकदमा चलाना बेकार है। लंबे मुकदमे के बाद जेल भेजने का क्या तुक है? उससे लोगों में भी गलत संदेश जाता है। मेरे खयाल से तो ऐसे लोगों के लिए मुफीद सजा  उन्हें खुलेआम बेइज्जत करना है। मुजरिमों को किसी सार्वजनिक जगह यानी किसी चौक या बाजार में ले जाना चाहिए। उन्हें एक मंच पर बिठा देना चाहिए, ताकि उन्हें आते-जाते लोग देख सकें। उनके जुर्म को बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा जाना चाहिए, ताकि लोग उनके जुर्म को आराम से पढ़ सकें। उन पर थू-थू कर सकें। अगर यह सजा कई दिनों तक चलती रही, तो मुजरिम फिर अपना मुंह किसी को दिखा नहीं पाएगा। लेकिन राजोआणा का क्या होगा? अगर उसे जिंदगी बख्श दी जाती है, तो बेहतर होगा। एक बर्बर सजा को खत्म करने के लिए यह एक ठोस कदम होगा। फांसी की सजा से अब निजात पा लेनी चाहिए।
 (ये लेखक के अपने विचार हैं) 

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