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बस, शुरू हो जाओ

वह काम अरसे से लटका हुआ है। एक बार लटक गया, सो लटक गया। रात घर लौटते हुए अफसोस भी होता है। अगले दिन सुबह करने का अपने से वायदा करते हैं, लेकिन फिर कहीं और फिसल जाते हैं। 

टले हुए कामों को करने का एक ही तरीका है। सब कुछ छोड़कर बस शुरू हो जाओ। एक बार शुरुआत हो जाएगी, तो सब ठीक हो जाएगा। यह मानना है डॉ. क्लिफर्ड एन. लैजारस का। वह मशहूर साइकोलॉजिस्ट हैं और लैजारस इंस्टीटय़ूट के क्लीनिकल डायरेक्टर हैं। उनकी मशहूर किताब है, ‘द सिक्स्टी सेकंड श्रिंक: 101 स्ट्रैटजीज फॉर स्टेयिंग सेन इन अ क्रेजी वर्ल्ड।’

लटके हुए कामों के साथ अक्सर ऐसा होता है। हम सोचते हैं और कहीं फिसल जाते हैं। सो, वह काम और भी लटक जाता है। ऐसा नहीं है कि हम उसे करना नहीं चाहते। यह भी नहीं कि हम उसे कर नहीं सकते। बस, हम एक अलसाए मन से उसे टालते चले जाते हैं। एक बार टल जाता है, तो फिर टालना ही फितरत बन जाती है। बस उसी फितरत को एक लगाम देनी है। दरअसल, किसी काम को टाल देने के बाद उसे पटरी पर लाना मुश्किल होता है। पटरी से उतर जाने के बाद वापसी उतनी आसान नहीं होती। उसके लिए हमें अपने इरादों को दुरुस्त करने की जरूरत होती है। कुछ अतिरिक्त करने की जरूरत होती है। हमें अलसाए और ऊबे खुद को कुछ करने के लिए धकेलना होता है। और इस धकेलने के लिए हमें एक किस्म के ‘कमिटमेंट’ की जरूरत होती है। हम अपने इरादों को मजबूत बनाएं। फिर एक समय-सीमा तय कर लें। उसे एक तय वक्त में कर लिया जाएगा। यह तय करते ही सब बदल जाएगा। लेकिन ये सब करने के लिए सबसे जरूरी है कि हम कहीं न कहीं से एक शुरुआत करें। एक बार किसी तरह वह शुरू हो जाएगा, तो काम हो ही जाएगा।

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