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बुजुर्गो के हक में

आज विश्व स्वास्थ्य दिवस है। इस बार का विषय है- बुढ़ापा। दुनिया की बड़ी आबादी बुढ़ाती जा रही है। आज से पांच साल बाद 65 साल और इससे अधिक उम्र के लोगों की तादाद पांच साल के बच्चों से अधिक होगी। मानव इतिहास में ऐसा पहली बार होने जा रहा है। इस जनसांख्यिकीय बदलाव में जीवन रक्षक दवाओं, सामाजिक-आर्थिक विकास व घटती प्रजनन दर का विशेष योगदान है। जाहिर है, इस परिवर्तन को सकारात्मक नजरिये से देखने की जरूरत है। लेकिन दुखद यह है कि बुढ़ाती उम्र को नकारात्मक रूप में देखा जाता है। बुजुर्ग समाज व संसाधनों पर बोझ माने जाते हैं। यह नकारात्मक सोच व्यक्तिगत स्तर पर भी मौजूद है।

निश्चित आयु के बाद लोग सफेद होते बालों को देखकर रोते हैं और अपने जन्मदिन पर खुद को कोसते हैं, जबकि वृद्धावस्था जिंदगी का वह पड़ाव है, जिस पर पहुंचने का जश्न मनाया जाना चाहिए। बुजुर्ग लोग समाज को कई तरह से लाभ पहुंचाते हैं। अपने अनुभव व ज्ञान के जरिये वे करीबियों को सही राह दिखाते हैं। यहां तक कि वे परिवार को आर्थिक मदद भी पहुंचाते हैं। उन्हें बढ़ती उम्र से जुड़ी स्वास्थ्य समस्याओं से जूझना पड़ता है, पर ये समस्याएं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उपेक्षित हैं। इन पर ध्यान देने की जरूरत है। बुजुर्ग आबादी को गैर संक्रामक रोगों से काफी खतरा रहता है। 60 वर्ष से अधिक के वृद्धों में दिल संबंधी बीमारियां आम हैं। कम और मध्य आय वर्ग वाले देशों के चार से 14 फीसदी बुजुर्ग ही इन हालात में सही व प्रभावी इलाज करा पाते हैं। इसके अलावा दुनिया भर के 25 करोड़ वरिष्ठ नागरिक आंशिक या पूरी तौर पर विकलांग हैं। इनमें अधिकतर ठीक से देख या सुन नहीं सकते। उनकी हड्डियां कमजोर हो चुकी हैं। वे अपना सुध-बुध गंवा चुके हैं। एक आकलन के मुताबिक, 28 से 35 फीसदी वृद्ध हर साल गंभीर चोटों के शिकार होते हैं। बुजुर्गो के साथ बढ़ती बदसलूकी एक गंभीर समस्या है। इसलिए विश्व स्वास्थ्य दिवस के मौके पर डब्ल्यूएचओ सेहतमंद जिंदगी जीने व बुजुर्गो के प्रति सकारात्मक नजरिया अपनाने के लिए एक खास मुहिम चला रहा है। इसमें हमें भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लेना चाहिए।    
                                    

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