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धमाल मुंडे-कुड़ियों दी.. लो आई बैसाखी

बैसाखी यानी मस्ती और भक्ति का अवसर। राजधानी में 13 अप्रैल को बैसाखी के अवसर पर तमाम गुरुद्वारों में विशेष कार्यक्रम होने वाले हैं। तो आप भी भांगड़ा और गिद्धा की मस्ती का आनन्द उठाने को तैयार हो जाइए। सत्य सिंधु लाए हैं तैयारियों का जायजा

गुरुद्वारों में अरदास और शबद कीर्तन, सभागारों में गुरुबाणी और मंचों पर भांगड़ा-गिद्धा की मस्ती। ये है बैसाखी। बैसाखी यानी पंजाबी संगीत के संग मस्त होने का मौसम, गुरुबाणी के आध्यात्मिक आनन्द में सराबोर होने का उत्सव और शबद-कीर्तन की भक्ति में डुबकी लगाने का अवसर। आजकल राजधानी में तन-मन को झुमाने वाले इस मौके की तैयारी धूमधाम से चल रही है।

आखिर 13 तारीख सामने जो है। भले ही यह पंजाब-हरियाणा का त्योहार माना जाता है, लेकिन आपके लिए भी बैसाखी की मस्ती में डुबकी लगाने के पूरे मौके हैं।

अशोक मस्ती संग मस्ती
लोक पर्व बैसाखी की मस्ती हर किसी के मन को छूती है। क्या बड़े क्या बच्चे, हर कोई इस त्योहार का आनन्द उठाना चाहता है। आप मौके का मतलब भले ही न जानते हैं, लेकिन मस्ती का मौका भला कहां चूकना चाहेंगे। इस उत्सव को राजधानी में कई तरह से मनाया जाता है। अगर आप डांस की मस्ती में डूबने के मूड में हैं तो बैसाखी की पूर्व संध्या पर यानी 12 अप्रैल को प्रेस क्लब के रायसीना स्थित परिसर में पहुंच सकते हैं, जहां अशोक मस्ती संग मस्त होने का मौका मिलेगा। बच्चे को भी संग ले जाएं तो मजा और बढ़ जाएगा। लेकिन इसके लिए आपको प्रेस क्लब के किसी सदस्य का साथ ढूंढना पड़ेगा।

संगीत संग भक्ति भी
डांस और म्यूजिक के साथ भक्ति भाव के लिए भी थोड़ा समय निकालना चाहते हैं तो राजधानी के किसी गुरुद्वारे में पहुंच जाएं। यहां पाठ-कीर्तन और अमृत संचार यानी अमृत पान करने का तो अवसर मिलेगा ही, शाम को नाचने-गाने का भी मौका मिलेगा। गुरुद्वारा रकाबगंज साहिब और गुरुद्वारा मजनूं का टीला पर तो सुबह 11 बजे से ही कार्यक्रम शुरू हो जाएगा। गुरुद्वारा रकाबगंज के भाई लखीशाह वंजारा हॉल में बैसाखी पूरब के अवसर पर आप खूब नाच-गा भी सकेंगे और इस अवसर का आनन्द उठा सकेंगे।

आ रहे हैं नामचीन कलाकार
पंजाबी अकादमी इस अवसर पर हर वर्ष दो कार्यक्रमों का आयोजन करती है, लेकिन इस बार 15 अप्रैल को होने वाले नगर निगम चुनाव के कारण एक ही कार्यक्रम किया जा रहा है। इस कार्यक्रम की भी तारीख थोड़ी आगे बढ़ा दी गई है। आप 20 से 22 अप्रैल तक तालकटोरा स्टेडियम के सुरताल ओपेन एयर थिएटर में आयोजित हो रहे ‘गुरबाणी संगीत समागम’ में शामिल हो सकते हैं। अकादमी के सचिव डॉ. रवैल सिंह बताते हैं, तीन दिनों के इस कार्यक्रम में राजधानीवासी देशभर के नामचीन कलाकारों को सुन सकेंगे। इन कलाकारों में दिल्ली की डॉ. गुरेंदर हरनाम सिंह, जालंधर के गगनदीप सिंह, भाई अमरीज सिंह जख्मी और आशुप्रीत कौर, लुधियाना के भाई मोहन सिंह, पटियाला के नीलेखान कव्वाल, कोलकाता के तुषार दत्ता और स्वर्ण मंदिर (अमृतसर) के भाई सर्बजीत सिंह प्रमुख हैं।

पंजाबी संगीत और भांगड़ा
इस अवसर पर आयोजित ‘पंजाबी बाई नेचर’ एक संगीत कार्यक्रम है। इसमें आप पंजाबी संगीत और भांगड़ा डांस का आनन्द उठा सकते हैं और बैसाखी को महसूस कर सकते हैं। यह आयोजन गुड़गांव के अपेरल हाउस स्थित इपिसेंटर में किया जा रहा है। सगुन, निगरुण और सूफी संगीत के संग कुछ खास पल बिताना चाहते हैं तो इस अवसर पर 13 अप्रैल की शाम लोधी रोड के कम्युनिटी कॉम्प्लेक्स स्थित कैफे जैफिरो पहुंच सकते हैं।

केरल और बंगाल का नया साल
एक मान्यता के अनुसार गंगा इसी दिन धरती पर उतरी थीं। इस कारण हिन्दुओं में इस दिन गंगा स्नान की भी परंपरा है।
जलियांवाला बाग कांड भी इसी दिन हुआ था। यानी स्वाधीनता संग्राम में भी इस तारीख का विशेष महत्व है।
पं. बंगाल का पोहला बैसाख और दक्षिण भारत का विशु भी खासा लोकप्रिय है जो नए साल की शुरुआत का उत्सव है। केरल के त्योहार विशु में लोग नए-नए कपड़े पहनते हैं और खूब आतिशबाजी भी करते हैं। इस दिन लोग फल, फूल, अन्न, सोना, वस्त्र आदि से विशु कानी सजाते हैं। पूजा-पाठ कर नए साल में सुख समृद्धि की कामना करते हैं।

इसी तरह पश्चिम बंगाल में इस दिन को पोहला बैसाख के रूप में मनाया जाता है। यह बंगाली कैलेंडर का पहला दिन होता है। यह तारीख कई बार 14 अप्रैल को भी पड़ती है।

इसलिए खास है यह दिन
अब जरा बैसाखी के आयोजन के बारे में भी जान ही लेते हैं। हम सब जानते हैं कि सर्दी की फसल की कटाई के अवसर का सेलेब्रेशन है यह बैसाखी। इसका दूसरा विशेष महत्व धर्म से जुड़ा है। सन 1699 को इसी 13 अप्रैल के दिन श्रीसगढ़ साहिब आनंदपुर में सिखों के दसवें गुरु गुरु गोविंदसिंह ने खालसा पंथ की स्थापना की थी। तब से हर वर्ष 13 अप्रैल को बैसाखी का आयोजन किया जाता है।

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