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कुदरत के करिश्मों सी कन्याकुमारी

कन्याकुमारी हमेशा से ही सैलानियों के आकर्षण का केंद्र रहा है। खास तौर से उत्तर, पश्चिम व पूर्वी भारत के लोगों को देश के नक्शे का यह नुकीला सिरा खासा लुभाता है। विदेशों से भी बड़ी तादाद में पर्यटक यहां आते हैं। यहां की विशेषताओं के बारे में बता रहे हैं दीपक दुआ

हर साल कन्याकुमारी पहुंचने वाले देसी-विदेशी पर्यटकों की संख्या 20 से 25 लाख के बीच रहती है और यह गिनती लगातार बढ़ती ही जा रही है। केरल से करीब होने के कारण भी कन्याकुमारी बहुत लोग आते हैं।
देखें तो क्या

विवेकानंद स्मारक: समुद्र के बीच स्थित इसी जगह पर स्वामी विवेकानंद ने शिकागो धर्म महासभा में जाने से पहले ध्यान लगाया था। तट से सरकार द्वारा चलाई जाने वाली फैरी से बहुत कम किराए में आप यहां जाकर आ सकते हैं। यहां स्वामी विवेकानंद की विशाल आदमकद मूर्ति के अलावा उनके गुरु स्वामी रामकृष्ण परमहंस और गुरु मां की तस्वीरें भी हैं। एक ध्यान मंडप भी है और एक शक्तिपीठ मंदिर भी। यहां से समुद्र का शानदार नीला नजारा नजर आता है। इसी के पास एक दूसरी चट्टान पर तमिल के संत कवि तिरूवल्लुवर की 133 फुट मूर्ति है। फैरी से यहां भी जाया जा सकता है।

शंकराचार्य मंदिर: कन्याकुमारी में तीन समुद्रों-बंगाल की खाड़ी, अरब सागर और हिन्द महासागर का मिलन होता है। इसलिए इस स्थान को त्रिवेणी संगम भी कहा जाता है। तट पर कांचीपुरम की श्री कांची कामकोटि पीठम का एक द्वार और शंकराचार्य का एक छोटा-सा मंदिर है। यहीं पर 12 स्तंभों वाला एक मंडप भी है जहां बैठ कर यात्री धार्मिक कर्मकांड करते हैं।

कुमारी मंदिर: तट पर ही कुमारी देवी का मंदिर है जहां देवी पार्वती के कन्या रूप को पूजा जाता है। मंदिर में प्रवेश के लिए पुरुषों को कमर से ऊपर के वस्त्र उतारने पड़ते हैं। प्रचलित कथा के अनुसार देवी का विवाह संपन्न न हो पाने के कारण बच गए दाल-चावल बाद में कंकड़ बन गए। आश्चर्यजनक रूप से कन्याकुमारी के समुद्र तट की रेत में दाल और चावल के आकार और रंग-रूप के कंकड़ बड़ी मात्र में देखे जा सकते हैं।

गांधी स्मारक: महात्मा गांधी की मृत्यु के बाद उनके अस्थि-अवशेषों को जिन बहुत सारे कलशों में भर कर देश भर की पवित्र नदियों में प्रवाहित किया गया था, उनमें से एक कलश यहां पर रखा गया था। बाद में यहां यह भवन बना जिसकी संरचना मंदिर, मस्जिद और चर्च के मिले-जुले आकार वाली है। जिस चबूतरे पर गांधी जी का अस्थि-कलश रखा गया था उसके ऊपर छत में एक सुराख छोड़ा गया है और साल में सिर्फ एक बार गांधी जी के जन्मदिन 2 अक्टूबर को उनके जन्म के समय यानी दिन के 12 बज कर 20 मिनट पर सूरज की किरणें इस छेद में से ठीक उस चबूतरे पर आ गिरती हैं।

संग्रहालय: गांधी स्मारक के सामने राजकीय संग्रहालय है जिसमें इस पूरे क्षेत्र से संकलित पाषाण मूर्तियों व पुरातात्विक महत्व की अन्य चीजों को प्रदशित किया गया है। करीब ही विवेकानंद वांडरिंग मोंक प्र्दशनी भी देखी जा सकती है। एक लाईट-हाउस भी पर्यटकों को आकर्षित करता है।

सूर्योदय और सूर्यास्त: कन्याकुमारी अपने सूर्योदय के दृश्य के लिए काफी प्रसिद्ध है। सुबह हर होटल की छत पर पर्यटकों की भारी भीड़ सूरज की अगवानी के लिए जमा हो जाती है। शाम को अरब सागर में डूबते सूरज को देखना भी यादगार होता है। उत्तर की ओर करीब दो-तीन किलोमीटर दूर एक सनसेट प्वाइंट भी है।

सेंट जेवियर चर्च: माना जाता है कि यीशु के शिष्य सेंट थॉमस इस जगह पर आए थे। फिर 16वीं सदी में यहां सेंट जेवियर आए जिनकी याद में यह खूबसूरत चर्च बनवाया गया।

घूमें थोड़ा आसपास

सर्कुलर फोर्ट: कन्याकुमारी से 6-7 किलोमीटर दूर वट्टाकोटाई किला यानी सर्कुलर फोर्ट है। काफी छोटा और बहुत खूबसूरत यह किला समुद्र के रास्ते से आने वाले दुश्मनों पर निगाह रखने के लिए राजा मरतड वर्मा द्वारा बनवाया गया था। इस किले के ऊपर से वट्टाकोटाई बीच का नजारा काफी खूबसूरत है।

शुचिंद्रम मंदिर: तिरुवनंतपुरम के रास्ते पर 15 किलोमीटर दूर ब्रह्मा, विष्णु और महेश को समर्पित यह प्राचीन मंदिर शैव और वैष्णव, दोनों ही संप्रदायों की आस्था का केंद्र है। 18 फुट ऊंची हनुमान की मूर्ति और संगीतमय स्तंभ भी इस मंदिर के आकर्षण को बढ़ाते हैं।

अहसास-ए-कन्याकुमारी
कन्याकुमारी जाएं तो दो-तीन दिन रह कर यहां के मोहक नजारों और कस्बेनुमा माहौल को महसूस करें। गलियों में घूमें, स्थानीय लोगों और उनके रहन-सहन को देखें, दक्षिण भारतीय भोजन का आनंद लें और खरीदारी करना चाहें तो शंख, सीप, कोड़ी आदि से बने सस्ते और सुंदर सामान खरीदें। यहां से लौटने के बाद यह मलाल न रहे कि काश, थोड़ा वक्त और गुजारा जाता। आखिर इतनी दूर कोई रोज-रोज तो जाता नहीं है।

कब जाएं
यहां साल भर गर्मी रहती है इसलिए कभी भी जाया जा सकता है। बारिशों में यहां का नजारा अलग ही होता है और दिसंबर-जनवरी में भी एयरकंडीशन की जरूरत पड़ सकती है।

कैसे पहुंचें
देश भर से रेल द्वारा जुड़ा हुआ है यह शहर। वैसे ज्यादातर यात्री यहां से करीब 80 किलोमीटर दूर त्रिवेंद्रम तक सुपरफास्ट गाड़ियों से आकर फिर यहां के लिए ट्रेन, बस या टैक्सी पकड़ते हैं। हवाई जहाज से जाना चाहें तो भी त्रिवेंद्रम ही जाना पड़ेगा।

कहां ठहरें
यहां हर जेब के मुताबिक बड़ी तादाद में होटल, गैस्ट हाऊस आदि हैं। इनमें से जो होटल समुद्र तट के करीब हैं उनका किराया थोड़ा ज्यादा होता है। एक परिवार के वहां ठहरने के लिए 200 से लेकर 5000 रुपये तक के कमरे हैं।

कैसे घूमें
बहुत ही उचित किराए पर ऑटोरिक्शा, टैक्सी और लोकल बसें भी हैं।

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