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छपे हुए अक्षरों के अंत की शुरुआत

चीन के नानजिंग शहर के जिंलिंग हाईस्कूल में यह तैयारी चल रही है कि सितंबर 2012 से कुछ छात्र किताबों का बस्ता लेकर स्कूल नहीं आएंगे। किताबों की जगह अब वे आई पैड लेकर क्लास में आएंगे। अगर यह प्रयोग सफल रहा, तो वहां सभी बच्चे किताबों की जगह आई पैड लाने लगेंगे। यानी अभी तक हम जिस किताबी ज्ञान का मुहावरा इस्तेमाल करते रहे हैं, वह भले ही बना रहे, लेकिन वह ज्ञान देने वाली किताबें स्कूल से विदा हो जाएंगी।

दूसरी खबर कुछ दिन पहले की है- दुनिया की जानी-मानी और 244 साल पुरानी ‘एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटैनिका’ का पुस्तक के रूप में प्रकाशन अब बंद हो गया है। इसे छापने वाली अमेरिकी कंपनी ने यह घोषणा की है कि अब यह पुस्तक सिर्फ डिजिटल फॉर्म में ऑनलाइन उपलब्ध हो पाएगी। साल 1990 में इसकी 1,20,000 प्रतियां बिकी थीं, जो 1996 में घटकर 40,000 रह गईं। इंटरनेट ने इस पुस्तक का छपना ही बंद करा दिया। यह पुस्तक तब से छप रही है, जब बिजली के बल्ब का आविष्कार भी नहीं हुआ था।

ये दोनों ही खबरें छपे हुए शब्दों के अंत की शुरुआत की ओर इशारा करती हैं। यह कहा जा रहा है कि गुटेनबर्ग ने जिस छापेखाने की शुरुआत की थी, उसकी विदाई की बेला आ गई है। हालांकि हम लोग प्रिंटेड शब्दों को पढ़ने के आदी हो चुके हैं। उन्हें पढ़ने में सहूलियत महसूस करते हैं। उन्हें हम लेटकर या बैठकर भी पढ़ सकते हैं। हमारी आंखें उन्हें पढ़ने की अभ्यस्त हैं, पर कंप्यूटर स्क्रीन पर हम उतनी तेजी से नहीं पढ़ पाते हैं। प्रिंटेड शब्द एक हजार साल जिए, ऐसी शुभकामनाओं का दौर शुरू हो गया है। लेकिन शुभकामनाओं के भरोसे ही छपे हुए शब्द शायद ज्यादा नहीं टिक पाएं। जब बॉल प्वॉइंट पेन की शुरुआत हुई थी, तब भी लोगों की शुभकामनाएं निब वाली फाउंटेन पेन के साथ थीं। मगर वैसी कलमें अब संग्रहालय की वस्तु बनकर रह गई हैं। जैसे बॉल प्वॉइंट वाली पेन के अर्थशास्त्र ने फाउंटेन पेन के चलन को खत्म कर दिया था, वैसे ही नए जमाने की ई-बुक्स अपनी नई सहूलियतों व अपने अर्थशास्त्र के साथ बाजार में आ रही हैं।

यूरोप और अमेरिका में तो कागज पर छपने वाले अखबारों की भी उल्टी गिनती शुरू हो गई है। वहां प्रिंटेड अखबारों की प्रसार संख्या लगातार घट रही है, पर भारत में अभी ऐसा नहीं है। हमारे देश में अभी इंटरनेट का प्रसार बहुत ज्यादा नहीं हुआ है। जनसंख्या तेजी से बढ़ रही है, पढ़े- लिखे लोगों की आबादी भी बढ़ रही है, आमदनी भी बढ़ी है। कई घरों में एक की जगह दो-दो अखबार खरीदे जाने लगे हैं। फिर भी आर्थिक हालात अभी ऐसे नहीं हैं कि हम तुरंत ही तय कर लें कि कागज बंद और ई-बुक्स व ई-अखबार शुरू। लेकिन पूरी दुनिया बदलेगी, तो हम भी उस बदलाव से शायद बहुत दिनों तक बच नहीं पाएंगे। 
(ये लेखक के अपने विचार हैं) 

 

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