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ईश्वर से दोस्ती

वह हर दुर्घटना, आपदा, परेशानी को ईश्वरीय दंड मानते हैं, जैसे ईश्वर हमेशा हाथों में चाबुक लिए देखते रहते हैं कि कहां उनके बनाए अनुशासन को तोड़ा जा रहा है। इसलिए वह डरे-डरे रहते हैं और मौका मिलते ही अनुष्ठान में जुट जाते हैं। उनके अनुसार, यह ईश्वर का आशीर्वाद पाने का तरीका है। यह वही तरीका है, जो ज्यादातर लोग जीवन भर अपनाते रहे हैं। लेकिन सच यह है कि ईश्वर ‘डर’ का नाम नहीं, बल्कि प्रेम भाव का नाम है। उनके साथ या तो मित्रता होनी चाहिए या फिर उनके प्रति हमें शिशु सुलभ होना चाहिए। विश्वास से भरपूर और पूरी तरह सहज। मशहूर दार्शनिक व लेखक वॉल्टेयर कहते हैं कि अगर मान भी लिया जाए कि ईश्वर का अस्तित्व नहीं है, तो भी जरूरी यह है कि एक दोस्त खोज लिया जाना चाहिए, क्योंकि दुनिया में किसे दोस्त की जरूरत नहीं होती। वॉल्टेयर ईश्वर के साथ अपने संबंध को दोस्ती का नाम देते थे।

दरअसल ईश्वर डर नहीं, सरल-सहज, दयालु और उदारमना प्रकृति का नाम है। उपन्यासकार मैक्सिम गोर्की ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि उन्होंने बचपन में दो-दो ईश्वर का सामना किया। एक नाना के ईश्वर, जो गुस्सैल और कठोर हृदय के थे, जबकि दूसरे नानी के ईश्वर- प्यारे और प्यार करने वाले थे। गोर्की ने माना कि नानी के ईश्वर का प्रभाव ही नानी पर पड़ा और अपने ईश्वर की तरह ही वह भी प्यारी थीं। दरअसल जैसा आपका ईश्वर है, वैसे ही आप हैं। वह ध्वनि हैं, तो हम प्रतिध्वनि। हम जब भी ईश्वर के साथ मित्रता का संबंध जोड़ते हैं, एक आंतरिक शक्ति और आनंद से खुद को भरा-पूरा पाते हैं। उनके प्रेम से खुद को प्रेममय पाते हैं। अगस्तीन ने ईश्वर से संबंध को लेकर एक अच्छी बात कही है- ईश्वर हममें से हर किसी को प्रेम करते हैं और इस तरह से करते हैं, जैसे पूरी दुनिया में हम ही एकमात्र हों। जहां प्रेम है, वहां डर की जगह नहीं होनी चाहिए।

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