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पिता से विदा लेते हुए..

वह मेरे लिए पूरियां लेकर आए हैं। ट्रेन चलने वाली है। वह चाहते हैं कि मैं अभी खा लूं, उनके सामने। मुझे भूख नहीं है और मैं उस ट्रैफिक पुलिस वाले पर अभी तक झल्ला रहा हूं, जिसकी वजह से आज ट्रेन छूट सकती थी। उन्हें लौटना है, क्योंकि वह जिस जगह पर लौटते हैं हमेशा से, जिस कस्बे में रहते हैं और जिसमें उन्होंने हमें सुंदर ढ़ग से पाला है, उसके लिए कहीं से भी अक्सर छह या सात बजे शाम के बाद बसें व रेलगाड़ी नहीं मिलतीं। वह फिर से कहते हैं कि मैं पूरियां खा लूं, क्योंकि उन्हें प्लास्टिक का यह टिफिन लेकर लौटना है। मुझे सच में लगता है कि उन्हें जल्दी टिफिन लेकर लौटने की है। मैं पूरियों का अखबार लेकर टिफिन उन्हें दे देता हूं और कहता हूं कि रेल चलने पर खाऊंगा। वह उतर जाते हैं।

रेल चल पड़ी है। मैं दरवाजे पर खड़ा हूं। जाते हुए वह बार-बार गिरने को होते हैं। मैं चिल्लाकर किसी से कहना चाहता हूं कि मेरे पिता हैं वह, उन्हें संभालो। लेकिन मैं चुप देखता रहता हूं। अचानक वह रुककर मुड़ते हैं और मुस्कराते हैं। कुछ चिल्लाते हैं, जो मुझे नहीं सुनाई पड़ता। वह ट्रेन की दिशा में तीन-चार कदम तेजी से बढ़ते हैं और फिर चिल्लाते हैं। मुझे अब भी नहीं सुनाता। फिर अपने साथ चल रहे एक आदमी को रोककर मेरी ओर इशारा करके कुछ कहते हैं। वह रेल के पिता नहीं हैं, इसलिए रेल बेझिझक प्लेटफॉर्म से निकल आई है। वह मेरे पिता हैं, लेकिन मैं भी तो निकल आया हूं। ऐसे कहां जाता हूं और क्यों?
मेरा सामान में गौरव सोलंकी

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