DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

दिखावे का रक्षा कवच

भारत के हेलमेट निर्माताओं का दावा है कि देश में बिकने वाले 85 प्रतिशत हेलमेट असुरक्षित हैं। ये हेलमेट ट्रैफिक पुलिस के चालान से तो बचा सकते हैं, लेकिन दुर्घटना के वक्त ज्यादा उपयोगी नहीं हैं। ये हेलमेट इसलिए लोकप्रिय हैं, क्योंकि ये सस्ते होते हैं और दोपहिया वाहन चलाने वाले भी इन्हें सिर्फ चालान से बचने के लिए पहनते हैं। यह विचार अब भी जड़ नहीं पकड़ पाया है कि हेलमेट सुरक्षा के लिए जरूरी है। इसीलिए महिलाएं और बच्चे हेलमेट नहीं पहनते और जहां ट्रैफिक पुलिस का डर नहीं है, वहां अन्य लोग भी हेलमेट नहीं पहनते। यह एक बड़ी समस्या है कि अभी तक आम भारतीय सड़क सुरक्षा को महत्वपूर्ण नहीं मानता। जहां पुलिस की सख्ती नहीं है, वहां कार चालक सीट बेल्ट नहीं लगाते। अगर ट्रैफिक पुलिस न हो, तो रेड लाइट में वाहन पार करने में लोगों को हिचकिचाहट नहीं होती। जहां तक संभव हो, लोग ट्रैफिक के जितने नियम हैं, उन्हें तोड़ने पर आमादा होते हैं। बड़े-बड़े राष्ट्रीय राजमार्गो पर जहां गाड़ियां सौ किलोमीटर से ज्यादा की गति से दौड़ती हैं, वहां भी गलत दिशा से वाहन आ जाते हैं, शहरों की आम सड़कों पर रिक्शा से लेकर ट्रक तक अपनी लंबाई से कहीं ज्यादा लंबे लोहे के सरिये या गर्डर लेकर चलते हैं। साफ है, भारतीय यातायात के नियमों को जबर्दस्ती के कानूनी व्यवधान मानते हैं, सुरक्षा के इंतजाम नहीं। इसके परिणाम हमारे सामने हैं। देश में हर साल लगभग एक लाख लोग सड़क दुर्घटनाओं में जान गंवाते हैं, जो दुनिया में सबसे ज्यादा है। इनमें से एक चौथाई के लगभग दोपहिया चालक हैं, जिनमें से कितनों की जान सही हेलमेट से बच सकती है। असुरक्षित और घटिया हेलमेट न सिर्फ दुर्घटना में अनुपयोगी होता है, बल्कि वह चोट को ज्यादा खतरनाक भी बना सकता है। भारत में आईएसआई मार्का हेलमेट का उत्पादन जितना होता है, उससे लगभग नौ गुना ज्यादा दोपहिए वाहनों की हर साल बिक्री होती है, यानी लगभग सिर्फ 15 प्रतिशत लोग ही आईएसआई मार्का हेलमेट खरीदते हैं, बाकी सिर्फ दिखावटी से काम चलाते हैं। लापरवाही की एक वजह सुरक्षा का ख्याल न करना तो है ही, साथ ही हेलमेट को भारतीय परिस्थितियों के मुताबिक ढालने और सुविधाजनक बनाने की कोशिश भी नहीं की गई है।

भारत में वाहन चलाना प्रतिष्ठा और ताकत का प्रतीक है, इसलिए किसी किस्म के नियम का पालन करना शान में गुस्ताखी माना जाता है। दूसरी मुश्किल यह है कि सड़क दुर्घटनाओं की गंभीरता को लोगों तक पहुंचाया नहीं गया है। ट्रैफिक पुलिस का भी रवैया सड़कों को सुरक्षित बनाने का कम, चालान काटकर जुर्माना वसूली का ज्यादा है। यह लापरवाही ड्राइविंग लाइसेंस बनाने में धांधली से ही शुरू होती है। अगर कोई व्यक्ति पैसा खर्च करने का तैयार हो, तो वह जितने चाहे, उतने ड्राइविंग लाइसेंस बनवा सकता है। बाकी दुनिया में ड्राइविंग लाइसेंस बनवाना पासपोर्ट बनवाने से भी कठिन काम है और इसकी परीक्षा में पास होने के लिए तमाम ट्रैफिक नियमों का ज्ञान होना जरूरी है। भारत में यहीं से गैरजिम्मेदारी और लापरवाही की शुरुआत होती है। घटिया हेलमेट इस्तेमाल करने वाले यह नहीं समझते कि दुर्घटनाओं में जो दोपहिया चालक मरते हैं, उनमें से ज्यादातर सिर की चोट से मरते हैं, जिससे एक अच्छे हेलमेट के सहारे बचा जा सकता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने सड़क दुर्घटनाओं को एक महामारी मानकर 2011-2020 को सड़क सुरक्षा दशक कहा है, जिसमें सड़क सुरक्षा के लिए तमाम योजनाएं अमल में लाई जाएंगी। इस दौर में अगर हम सड़क हादसों के दंश का कलंक मिटा सके, तो अच्छा होगा।

 

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:दिखावे का रक्षा कवच