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एक और अफगानिस्तान

संयुक्त राष्ट्र महासभा के प्रस्ताव के बावजूद सीरिया में हिंसा जारी है, जबकि उस प्रस्ताव में कहा गया था कि सीरिया के सदर बशर अल असद गद्दी छोड़ें और बगावत को कुचलना बंद करें। फिर भी बीते शनिवार को राजधानी दमिश्क में काफी हिंसा हुई। असद के सुरक्षा दस्ते ने जनाजे में शामिल लोगों पर आंसू गैस छोड़े और गोलियां चलाईं। ये लोग उन तीन नौजवानों को दफनाने जा रहे थे, जिनकी हत्या असद का विरोध करने के कारण कर दी गई थी। मार्च में सीरियाई आंदोलन के एक साल हो गए और अब तक हिंसा में कोई कमी नहीं आई है। मुल्क में चारों तरफ अराजकता का आलम है। यह तेजी से अफगानिस्तान जैसा बनता जा रहा है। गुरुवार को सीनेट आर्म्ड सर्विसेज कमेटी की बैठक में अमेरिकी खुफिया महकमे के मुखिया जेम्स क्लैप्पर ने इस बात की तस्दीक की कि सीरिया में हालात बेकाबू होते जा रहे हैं। उन्होंने कहा, ‘विपक्षी खेमे में कट्टरपंथियों ने सेंध लगाई है।’ दिसंबर में दमिश्क में हुए दो धमाके और एलेप्पो में दो कार बम विस्फोटों से ‘जाहिर होता है कि इन हमलों में अल-कायदा का हाथ है।’ द डेली टेलीग्राफ ने भी नवंबर में एक रिपोर्ट छापी थी कि त्रिपोली मिलिटरी कौंसिल का सरगना और लीबियाई इस्लामी समूह का पूर्व नेता अब्दुल हकीम बेलहद्ज इन दिनों इस्तांबुल में है और फ्री सीरियन आर्मी के नेताओं से उसकी मुलाकात हुई है। इसके तुरंत बाद रूसी अखबार ने यह खुलासा किया था कि सीरिया में विपक्षी खेमे को लीबिया से मदद मिल रही है। इस रिपोर्ट के मुताबिक, लीबियाई लड़ाकों की एक टुकड़ी की तैनाती तुर्की-सीरिया सरहद पर की गई है। एक अन्य रूसी अखबार का कहना है कि 600 लीबियाई लड़ाकों को सीरिया में विपक्षी गुट की मदद के लिए भेजा गया है। हालांकि फ्री सीरियन आर्मी ने इन खबरों को गलत बताया है। इसके बावजूद, मुल्क के बिगड़े हालात को कट्टरपंथी भुना सकते हैं। इन स्थिति का असर इराक और लेबनान पर भी पड़ सकता है। इजरायल भी खुद को इससे दूर नहीं रख सकता है। हालांकि अरब वर्ल्ड में कोई भी अपने आस-पास एक और अफगानिस्तान देखने को तैयार नहीं है।
द पेनिनसुला, कतर

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