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जल्द खत्म होगा एसआईटी का वजूद

प्रदेश सरकार करीब पांच साल पहले सीबीआई की तर्ज पर आर्थिक भ्रष्टाचार से निपटने के लिए स्थापित की गई एसआईटी (स्पेशल इवेस्टीगेशन टीम) का वजूद खत्म करने पर विचार कर रही है। पिछली बसपा सरकार द्वारा इसके गठन का मकसद उत्तर प्रदेश राज्य औद्योगिक विकास निगम (यूपीएसआईडीसी) में असरदार लोगों के खिलाफ आर्थिक अपराध की जांच करना था। लेकिन मकसद में सफल न होने के कारण अब प्रदेश पुलिस की इस विंग को खत्म करने पर विचार हो रहा है। इसके लिए डीजीपी मुख्यालय भी सहमत हो गया है।

बसपा सरकार ने 16 जून 2007 को स्पेशल इंवेस्टीगेशन टीम का गठन किया था। इसे सीबीआई की तर्ज पर थाने का दर्जा देकर अभियोग पंजीकृत करने और प्रारंभिक जांच व तफ्तीश का अधिकार दिया गया। सरकार का दावा था कि असरदार लोगों मसलन, बड़े प्रशासनिक अधिकारियों, बड़े घोटालेबाजों और सफेदपोश नेताओं के खिलाफ जांच के लिए एसआईटी प्रभावी रूप से कार्रवाई करेगी। हालांकि एसआईटी के गठन के साथ ही इसके औचित्य को लेकर सवाल खड़े हो रहे थे, लेकिन प्रदेश में नया निजाम आने के बाद अब गृह विभाग एसआईटी को खत्म करने पर विचार कर रहा है।

पुलिस अधिकारियों का तर्क है कि एसआईटी का गठन एक शासनादेश के तहत किया गया था, जबकि असरदार लोगों के खिलाफ जांच के लिए पहले से ही सतर्कता अधिष्ठान (विजिलेंस)मौजूद है। विजिलेंस एक अधिनियम के तहत कार्य करता है। इसे बड़े प्रशासनिक अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई का अधिकारी है, जबकि ईओडब्ल्यू पहले से ही बड़े घोटालों की जांच के लिए अधिकृत एजेंसी है।

छोटे कर्मचारियों के खिलाफ जांच के लिए भ्रष्टाचार निवारण इकाई कार्यरत है। ऐसे में एसआईटी को अलग से गठित करने का क्या तात्पर्य? नतीजतन, प्रदेश का गृह विभाग अब एसआईटी को खत्म करने पर कार्य कर रहा है। इसके लिए डीजीपी मुख्यालय ने पहले ही अपनी सहमति दे दी है।

गौरतलब है कि यूपीएसआईडीसी का चर्चित रहा एक मुख्य अभियंता कई राजनैतिक दलों के बड़े नेताओं का चहेता रहा है और उस पर निगम को सैकड़ों करोड़ का चूना लगाने काआरोप है। मनी लाण्डरिंग केस में सीबीआई उसे जेल भी भेज चुकी है।

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