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पॉजिटिव सोच तरक्की का व्यापक नजरिया

सकारात्मक मनोविज्ञान, सिर्फ सकारात्मक सोच तक सीमित नहीं है। इससे व्यक्ति को न सिर्फ अपनी भावनाओं को नियंत्रित करने में मदद मिलती है, बल्कि वर्कप्लेस पर मजबूत कार्यसंबंध भी विकसित होते हैं। कार्यस्थल पर सकारात्मक कार्य संस्कृति विकसित करने में सबसे बड़ा योगदान वहां काम करने वालों का होता है। बता रही हैं प्रीति शर्मा

एक अच्छे पत्रकारिता महाविद्यालय से डिग्री हासिल करने के बाद नौकरी की तलाश में लगे संजीव वर्मा और उनके सहपाठी सत्यम ने कई जगह अपना रिज्यूमे भेजा। एक प्रतिष्ठित मीडिया संस्थान से लिखित परीक्षा का बुलावा आया। इस परीक्षा में वे सफल रहे और उन्हें साक्षात्कार के लिए बुलाया गया। संजीव वर्मा के साक्षात्कार के शुरुआती 15 मिनट ठीक रहे, लेकिन अंतिम चरण में उनके एक जवाब ने उनकी उम्मीदों पर पानी फेर दिया। सवाल था- मान लीजिए संस्थान कर्मचारियों की संख्या 10 प्रतिशत कम करने की योजना बनाता है, क्योंकि टॉप मैनेजमेंट को लगता है कि कर्मचारियों की संख्या आवश्यकता से अधिक है तो आपकी पहली प्रतिक्रिया क्या होगी? उनका जवाब था- मैं इन सब चीजों पर ज्यादा नहीं सोचता। जब ऐसा होगा, तब सोचेंगे। साक्षात्कार में जब यही सवाल सत्यम से पूछा गया तो उनका जवाब थोड़ा अलग था। उन्होंने कहा- मैं इस बारे में चिंता नहीं करूंगा, क्योंकि मुझे उम्मीद है कि मैं अपने संस्थान के सर्वश्रेष्ठ कर्मचारियों में से एक होऊंगा। सत्यम को चुन लिया गया।

ज्यादातर चीजें ठीक होने के बावजूद आखिर क्या वजह थी कि संजीव का चयन नहीं हुआ? जवाब है- साक्षात्कार में पूछे गए प्रश्न का जो उत्तर संजीव ने दिया था, उसमें उदासीनता की झलक थी। वहीं सत्यम के जवाब में एक सकारात्मकता थी, जिसने इंटरव्यू बोर्ड में बैठे लोगों को प्रभावित किया।

नौकरी की तलाश में निकलने वाले अनगिनत युवाओं को इंटरव्यू में ऐसे सवालों का सामना करना पड़ता है। आजकल अधिकांश बड़ी कंपनियां आवेदकों की शैक्षणिक और पेशेवर योग्यता के साथ-साथ उनकी सोचने की प्रवृत्ति को भी जांचने की कोशिश करती हैं। इसके पीछे उनका उद्देश्य होता है कार्यस्थल पर एक सकारात्मक कार्य संस्कृति का निर्माण। मोबाइल बनाने वाली कंपनी लावा इंटरनेशनल लि. के मुख्य मानव संसाधन (एचआर) अधिकारी विवेक त्रिपाठी के मुताबिक, ‘एक स्वस्थ और विशिष्ट कार्य संस्कृति से ही सही परिणाम हासिल होते हैं। संदेश साफ है कि प्रतिस्पर्धा के इस दौर में आप सकारात्मक नहीं रहेंगे तो करियर में ज्यादा आगे बढ़ पाना मुमकिन नहीं हो सकेगा। हां, एक बात जरूर याद रखें। सकारात्मक सोच अथवा प्रवृत्ति का मतलब यह नहीं है कि शुतुरमुर्ग की तरह रेत में सिर छिपा कर जीवन में आने वाली अप्रिय स्थितियों को नजरअंदाज कर दें। सकारात्मक सोच का मतलब यह है कि जीवन की अप्रिय घटनाओं से अधिक पॉजिटिव और प्रोडक्टिव तरीके से निबटें।’

सकारात्मक सोच और कार्य संस्कृति
पॉजिटिव सोच से व्यक्ति की कार्यक्षमता में वृद्धि होती है। सकारात्मक मनोविज्ञान शोधों के जरिये कई लक्षणों की पहचान की गई है, जिनसे कार्य क्षमता पर प्रभाव पड़ता है। इनमें से एक महत्त्वपूर्ण लक्षण है अच्छी अनुभूति। जब हम सकारात्मक भावनाओं, जैसे- जोश, आनंद आदि का अनुभव करते हैं तो हमारे मस्तिष्क में सेरोटोनिन और डोपामाइन हारमोन का प्रवाह होता है। इसका अर्थ यह होता है कि हमारा मस्तिष्क बेहतर, तीव्रतर और ज्यादा गंभीरता से काम करने में सक्षम होता है। गुड़गांव की एक मल्टीनेशनल कंपनी के एचआर विभाग में काम करने वाली पुण्या जैन बताती हैं, ‘पॉजिटिव वर्क कल्चर मैनेजमेंट का कोई रटा-रटाया जुमला नहीं है। कार्य उत्पादकता पर पड़ने वाले सकारात्मक प्रभाव के कारण ही बड़ी कंपनियां प्रतियोगिता के इस दौर में पॉजिटिव वर्क कल्चर को बढ़ावा देने की दिशा में काम कर रही हैं। मसलन-

- संस्थान के लक्ष्य, कार्य प्रणाली और मूल्यों से कर्मचारियों को अवगत कराना।
- रचनात्मक और सकारात्मक सोच रखने वालों को कंपनी में लाना।
- विभिन्न गतिविधियों में कर्मचारियों को शामिल करना। निष्पक्ष रूप से कर्मचारियों से किसी मुद्दे विशेष में सुधार करने के लिए सुझाव मांगना।
- निर्णय प्रक्रिया में कर्मचारियों को शामिल करना। जिम्मेदारियां देकर उनमें नेतृत्व क्षमता का विकास करना। संवाद-प्रक्रिया को खुला रखना, ताकि संस्थान में खुलेपन की संस्कृति को बढ़ावा मिले।
- अगर कोई अच्छा काम करता है तो उसे प्रोत्साहित और पुरस्कृत करना। इन-हाउस मैगजीन और इन-मेल द्वारा पुरस्कृत व्यक्ति की सूचना सभी कर्मचारियों तक पहुंचाना आदि।
- कर्मचारियों के फीडबैक को अहमियत देना। यदि किसी कर्मचारी के सुझाव से कंपनी की कार्य-प्रणाली में सुधार आता है अथवा काम आसान होता है तो उस कर्मचारी को श्रेय देते हुए कुछ उपहार देना।
- वर्कप्लेस पर विभिन्न तरह के आयोजन करना, जैसे- इनडोर खेल, संगीत व क्विज और दूसरी रोचक प्रतियोगिताएं। कई कंपनियां कर्मचारियों को वेतन के अलावा अन्य सुविधाएं भी मुहैया कराती हैं, जैसे कर्मचारी और उसके परिवार को हेल्थ इंश्योरेंस, नि:शुल्क स्वास्थ्य जांच शिविर आदि। कई कंपनियां समय-समय पर मोटिवेशन लीडर्स को भी आमंत्रित करती हैं।
    
यूं करें नकारात्मक सोच को दूर

- सबसे पहले अपने काम और जीवन के उन पहलुओं की पहचान कीजिए, जिनके बारे में आप निराशावादी ढंग से सोचते हैं।
- खुशमिजाज रहने की कोशिश करें। खासकर मुश्किल समय में। स्वस्थ जीवनशैली अपनाएं। सप्ताह में कम से कम तीन बार व्यायाम करने से तनाव घटता है।
- सकारात्मक लोगों के साथ रहने की कोशिश करें। लंबे समय तक नकारात्मक लोगों के साथ रहने से आप हर बात को संदेह की दृष्टि से देखने लगते हैं।
- अगर ऑफिस में कोई कठिन कार्य दिया जाता है तो ऐसा न सोचें कि आप इसे कैसे करेंगे, आपके बॉस ने कुछ सोच कर ऐसा किया होगा। सोचें कि यह कुछ नया सीखने का अवसर है।
- सकारात्मक व्यक्ति अपना सर्वश्रेष्ठ देने की कोशिश करता है। यही वजह है कि नियोक्ता भी ऐसे ही लोगों को नौकरी देने में रुचि रखते हैं। विवेक कहते हैं ' किसी कंपनी में स्वस्थ संगठनात्मक संस्कृति विकसित करने में लीडरशिप की भी बड़ी भूमिका होती है। लीडर्स का वास्तविक व्यवहार संस्थान की वास्तविक संस्कृति को निर्धारित करता है। ऐसे में टीम के सदस्यों में सकारात्मक माहौल विकसित करने पर भी ध्यान दिया जाता है।’

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