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बच्चों को पढ़ाने में निकल रही है जान

पटना। हर अभिभावक की हसरत अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा देने की रहती है। आमतौर पर इसके लिए लोग प्राइवेट स्कूलों का सहारा लेते हैं। सोच यही रहती है कि बच्चों की पढ़ाई अच्छी तरह से होगी। पर यह हसरतअभिभावकों की जेब पर काफी भारी पड़ रही है। महंगाई के इस दौर में शिक्षा हद से ज्यादा महंगी हो गई है। पिछले दो सालों में स्कूलों की टय़ूशन फीस तो दुगुनी हुई ही एड़ािशन फीस भी दुगनी हो गई है। यही नहीं, किताबों के साथ-साथ स्टेशनरी और कॉपियों के दाम ने भी आसमान छू लिया है। इस मुसीबत के दौर में स्कूल भी अभिभावकों को रियायत देते नहीं दिख रहे हैं।

स्कूल से ही सभी सामान खरीदने की बाध्यता के कारण, बाहर से वे कम मूल्यों पर किताब, कॉपी के साथ स्टेशनरी भी नहीं खरीद सकते हैं।हर साल 40 फीसदी तक हो रही है वृद्धिशहर के एक प्रतिष्ठित स्कूल मैरी वार्ड (सेंट जोसेफ कान्वेंट के सामने) में 2008 में एक महीने के फीस के तौर पर 550 रुपए लिए जाते थे। इस साल की फीस के तौर पर करीब 1400 रुपए देने पड़ रहे हैं। इसी तरह डीएवी स्कूल में पिछले साल के मुकाबले 25 फीसदी की वृद्धि हुई और इस साल 40 फीसदी तक वृद्धि हुई। यही हाल अन्य स्कूलों का भी है।

इस साल फीस में वृद्धि 150 रुपए से 300 रुपए प्रति माह हुई है। स्कूलों के एड़ािशन फीस में भी बेतहाशा वृद्धि हुई है। 2008 में मैरी वार्ड में ही एडमिशन के समय 4300 रुपए देने पड़े थे। इस साल इसके लिए नौ हजार रुपए देने पड़ रहे हैं। ट्रांसपोर्ट फीस में भी इसी लिहाज से वृद्धि जारी है।किताबों के दाम में भी बेतहाशा वृद्धिविभिन्न स्कूल विभिन्न प्रकाशकों की किताबें चलाते हैं। ये प्रकाशक भी हर साल किताबों के मूल्य में वृद्धि कर रहे हैं।आम तौर पर स्कूल वाले ऑक्सफोर्ड, भारती भवन, एस. चांद और सृजन जैसे पब्लिकेशन की किताबें चलाते हैं। इन किताबों के दाम में 20 प्रतिशत तक वृद्धि हुई है। सीबीएसई स्कूल की सातवीं कक्षा की किताब के लिए पिछले साल जहां 2000 से 2400 लग रहे थे वहीं इस साल 3000 से 3600 रुपए लग रहे हैं। असल में पेपर के दाम में वृद्धि होने के कारण ऐसा हुआ है।

पर मार्केट पर इस वृद्धि का कोई असर नहीं हुआ है। किताबें पहले की तरह ही बिक रही है और खूब भीड़ जुट रही है। एनसीईआरटी की किताबों के मूल्य में भी कई वर्षो के बाद 40 फीसदी तक की वृद्धि की गई है। कॉपी भी कर रही है परेशानकिताब के साथ कॉपी के दाम में भी वृद्धि हुई है। क्लासमेट की कॉपी पिछले साल जहां 27 रुपए में मिल रही थी वही इसबार दाम बढ़कर 30 रुपए हो गया है। नवनीत के नोटबुक में भी तीन से चार रुपए तक की वृद्धि हुई है। जिन कॉपियों का दाम नहीं बढ़ा है, वहां पेजों की संख्या कम कर दी गई है। पिछले साल जिसमें 124 पेज हुआ करते थे, वह कॉपी अब 108 पेज की आ रही है।

फाइल 35 रुपए के बजाए 40 रुपए में और रजिस्टर 65 के बजाए 70 रुपए में मिल रहा है। पांच रुपये का स्केल 12 रुपए मेंकई स्कूल किताब, कॉपी और स्टेशनरी के लिए किसी खास दुकान में जाने के लिए कहते हैं। कुछ स्कूल अपने परिसर में दुकान लगा लेते हैं। यहां कई तरह की मनमानी होती है। किताबें प्रिंट दाम पर उपलब्ध रहती है। नवनीत और क्लासमेट की कॉपी में स्कूल का नाम प्रिंट करवा देते हैं और इसके लिए बदले में कुछ रुपए ज्यादा वसूले जाते हैं। एक अभिभावक का कहना है कि जो स्केल बाजार में पांच रुपए में उपलब्ध होती है, वह स्कूल में 12 रुपए में मिलती है। इसी तरह से अन्य स्टेशनरी के दाम भी मनमाने तरीके से तय किए हुए रहते हैं।

कलम और पेंसिल के दाम में वृद्धि हो गई है। पायलट का वी फाइव जो 45 रुपए में आता था अब 60 रुपए में मिल रहा है। नटराज की पेंसिल का डब्बा अब 30 के बजाए 40 रुपए में मिल रहा है। ड्राइंग के लिए आने वाले पेंट के दाम में भी वृद्धि हो गई है। साथ ही साथ बढ़े हुए दाम के साथ कई कंपनियों के नए प्रोडक्ट बाजार में आ गए हैं। जूते तक खरीदने होते हैं खास दुकानों सेअभिभावकों को यूनिफॉर्म सहित जूते खरीदने के लिए भी किसी खास दुकान में जाना पड़ता है।

अन्य जगहों से लिए गए सामान मान्य नहीं होते हैं। पिछले साल एक स्कूल ने एक खास मल्टीनेशनल कंपनी के जूते खरीदने के लिए ही नोटिस जारी किया था। इस जूते की कीमत 1600 रुपए के आसपास थी। यह इस साल भी जारी है।नहीं मिल रही है किताबेंआमतौर पर अन्य प्रकाशकों की किताबों के तुलना में एनसीईआरटी की किताबें सस्ती होती है। केंद्रीय विद्यालय के साथ-साथ कुछ प्राइवेट स्कूल भी एनसीईआरटी की किताबें चलाते हैं। लेकिन एनसीईआरटी की किताबें दुकान में उपलब्ध नहीं हो रही है।

छठी से 12वीं कक्षा की कुछ किताबों को छोड़कर अधिकतर किताबें दुकान में मौजूद नहीं है। यह स्थिति करीब पिछले एक महीने से बरकरार है। इंडिया बुक डिपो के मालिक केके अग्रवाल ने कहा कि यह अभी तक स्पष्ट नहीं हो पा रहा है कि कब से किताबें उपलब्ध होगी।केंद्रीय विद्यालय का नुस्खा अच्छाकिताबों की अनुपलब्धता के बीच केंद्रीय विद्यालय ने पढ़ाई जारी रखने के लिए नायाब तरीका ढूंढा है। यहां लाइब्रेरी से किताबें उपलब्ध कराई गई है और इसे शेयर करके पढ़ने की नसीहत दी जा रही है। अगर किसी बच्चों के पास किताब उपलब्ध हो गई है तो वे अपने सहपाठियों के बीच इसे बांटने से परहेज नहीं कर रहे हैं।

अभिभावकों को क्या लगता है बुरामजबूरी का फायदा उठाते हैं स्कूलहर साल स्कूल फीस में बढ़ोतरी स्कूल से ही किताब, कॉपी और स्टेशनरी खरीदने की बाध्यताहर साल किताबें बदल देनाकिसी खास दुकान से स्टेशनरी, किताबें सहित अन्य चीजें खरीदने की बाध्यताएक आम परिवार की कहानीछठे वेतनमान का फायदा मुश्किल से छह प्रतिशत लोगों को मिला होगा लेकिन इस कारण हुई महंगाई की मार सभी को ङोलनी पड़ रही है। अगर किसी मध्यमवर्गीय परिवार से दो या तीन बच्चों स्कूल में पढ़ाई करते हों तो उनके खर्च का अनुमान आप लगा सकते हैं।

एक बच्चों की स्कूल फीस और ट्रासपोर्ट सहित अन्य खर्च पर प्रति माह दो हजार रुपए खर्च पड़ेंगे। दो बच्चों पर यह खर्च चार हजार बैठेगा। एडमिशन के समय बच्चों के किताब और स्टेशनरी पर औसतन 15 हजार रुपए खर्च होते हैं। दो बच्चों पर यह खर्च करीब तीस हजार होगी। इन सभी के अलावा बीच-बीच में भी कुछ पैसे अभिभावकों को देने पड़ते हैं।

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