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आईपीएल तमाशा या खेल?

आईपीएल ने रोमांच के खेल क्रिकेट को दौलत और शोहरत का खेल बना दिया है। नए खिलाड़ियों के लिए यह जहां भारतीय टीम में आने का मंच है, वहीं पुराने खिलाड़ियों के लिए अकूत दौलत कमाने का जरिया। यही नहीं, इसके जरिए इससे जुड़ा बाजार भी उछाल मारने लगता है। कुछ लोगों की नजर में यह महज तमाशा है, जो सीरियस क्रिकेट को  बर्बाद कर रहा है। आईपीएल के विकास और टीम इंडिया पर इसके साइड इफेक्ट्स पर बात कर रहे हैं संजय श्रीवास्तव-

पिछले दो साल से भारतीय क्रिकेट टीम की थकान और खराब प्रदर्शन के लिए जिस इंडियन प्रीमियर लीग पर लगातार आरोप लग रहे हैं, उसका पांचवां संस्करण आ गया है। पिछले आईपीएल से इस आईपीएल के बीच हमारे पास अच्छी यादें कम हैं और खराब ज्यादा। इसी दौरान विदेशी धरती पर टेस्ट और वन-डे मैचों में हमारी दुर्गति सारी दुनिया ने देखी। इतने खराब परिणाम का कड़वा घूंट कई दशकों में पहली बार पीना पड़ा। भारतीय क्रिकेट जिस रफ्तार से आगे की तरफ भाग रहा था, उसमें मानो रिवर्स गेयर लग गया।

आईपीएल-4 से आईपीएल-5 के बीच टीम इंडिया ने 31 वन-डे, 14 टेस्ट मैच और पांच टी20 मैच खेले। विदेशी धरती पर इंग्लैंड व आस्ट्रेलिया के खिलाफ 0-4 से सिरीज गंवाई। नंबर एक टेस्ट टीम का दर्जा तो गया ही, अब आशंका है कि रैंकिंग की इस लिस्ट में हम चौथे नंबर पर खिसकने वाले हैं। इसी तरह वन-डे में नीचे जाने के आसार हैं। हमारी हर हार के बाद आईपीएल को कुछ पुराने क्रिकेटरों और विशेषज्ञों ने पानी पी-पीकर कोसा। आरोप लगा कि टी20 लीग के चलते ही सारा बेड़ा गर्क हो गया। इंग्लैंड में जब हम चारों खाने चित्त हो गये, तब कप्तान महेंद्र सिंह धौनी ने टीम की थकान और चोटों की बात कही।

आंकड़े बताते हैं कि हमने बीते सीजन में कुल 134 दिन सक्रिय इंटरनेशनल क्रिकेट खेला। इसके अलावा यात्रा में करीब सौ दिन लगाये। इस दौरान टीम में तमाम नये खिलाड़ियों को आजमाया गया। उनमें आमतौर पर जबरदस्त कमियां दिखीं। निष्कर्ष निकाला गया कि ऐसा इसलिए हो रहा है, क्योंकि टी20 के चलते हम क्लासिकल क्रिकेट से दूर चले गये हैं। नये खिलाड़ी पांच दिन के टेस्ट मैच खेलना नहीं चाहते। उनके पास न तो पांच दिन के मैचों का स्टेमिना है और न ही वैसा टैम्परामेंट। पुराने खिलाड़ियों में से ज्यादातर संन्यास की उम्र के करीब पहुंच रहे हैं। आईपीएल-5 शुरू होने से दो दिन पहले गौतम गंभीर ने कहा कि नये खिलाड़ियों में तकनीक का अभाव है, इसीलिए वो टेस्ट में नाकाम हो रहे हैं। हमें ये देखना होगा कि पिछले कुछ सालों में घरेलू प्रथम श्रेणी क्रिकेट से हमें दमदार खिलाडी़ क्यों नहीं मिल पा रहे। आईपीएल के ऊपर फोकस के चलते न तो बीसीसीआई का ध्यान घरेलू क्रिकेट पर है, न ही खुद खिलाड़ियों का। क्लब लेवल पर भी अच्छा प्रदर्शन कर रहे जूनियर क्रिकेटर आईपीएल फ्रेंचाइजी में पहुंचने का जुगाड़ लगाना शुरू कर देते हैं। किसी भी फ्रेंचाइजी में घरेलू क्रिकेटर का दर्जा सबसे निचला होता है, जो क्लब लेवल या रणजी में खेल चुके खिलाड़ियों को ये फ्रेंचाइजी देती हैं और उनके साथ सीधे करार करती हैं। इस करार से उन्हें तुरंत एक सीजन के दस से 15 लाख रुपये मिल जाते हैं। हालांकि ऐसे खिलाड़ियों को बमुश्किल ही फ्रेंचाइजी से खेलने का सौभाग्य हासिल हो पाता है। आमतौर पर वह मैदान से बाहर ही बैठे होते हैं। लेकिन ये उन्हें इसलिए ज्यादा माफिक लगता है, क्योंकि इससे उन्हें अच्छे खासे पैसे मिल जाते हैं। पिछले कुछ सालों में नये खिलाड़ियों को आईपीएल में अच्छे प्रदर्शन के चलते नेशनल टीम में अधिक जगह मिली है, बजाय घरेलू प्रथम श्रेणी क्रिकेट के जरिए। ऐसे में बेहतरीन क्रिकेटर पैदा करने वाला हमारा देसी ढांचा चौपट होगा ही।

खैर हम आईपीएल पांच पर आते हैं। पिछले साल हुए आईपीएएल 4 को टीवी रेटिंग और दर्शकों की संख्या के लिहाज से सफल तो किसी लिहाज से नहीं कह सकते। उसका असर अब भी है। कुछ बाजार की अपनी दिक्कतें भी हैं, जिससे आईपीएल के मौजूदा संस्करण को ज्यादा गरमी मिलती हुई नहीं दिख रही। एक तरह से ये आईपीएल का सबसे चुनौतीपूर्ण संस्करण होगा, अगर इस बार भी दर्शक इनसे दूर रहे और टीवी पर व्युअरशिप नहीं बढ़ी तो इसका मर्सिया पढ़ा जाने लगेगा। आईपीएल 4 के ज्यादा लोकप्रिय नहीं हो पाने की एक वजह क्रिकेट का ओवरडोज भी था। वर्ष 2011 में फरवरी के दूसरे हफ्ते से चला वर्ल्ड कप मार्च को पार कर 02 अप्रैल को जाकर थमा। भारत ने इसे जीता, लेकिन इस क्रिकेट के महाकुंभ के बाद दो महीने की लीग को झेल पाना शायद कुछ मुश्किल था।
एक लोचा और भी है। हम पिछले दिनों इस कदर हारे हैं कि लोगों के दिमाग में क्रिकेट को लेकर निगेटिव फीलिंग आ गई है। ये बात आईपीएल ब्रॉडकास्ट करने वाली टीवी कंपनी सेट मैक्स के अधिकारी भी मानते हैं।

कमेंटेटर व पूर्व क्रिकेटर नवजोत सिंह सिद्धू का कहना वाजिब है कि अगर क्रिकेटर को इतनी मोटी रकम मिल रही हो, जो वो दस साल खेलकर भी नहीं कमा पाये तो भला देशहित की बजाय आईपीएल को तवज्जो क्यों नहीं दे, आखिर उसे भी पैसा कमाना है। बात सही है, पैसे की दौड़ में देश के लिए जान लड़ाकर खेलना पीछे छूट रहा है। 

आईपीएल ने दुनिया में तेजी से बढ़ते खेलों के बाजार में हमारी हैसियत तो बनाई है। हम पैसा उगलने वाली दुनिया की पांच बड़ी स्पोर्ट्स लीग में शुमार होने लगे हैं। खेलों का ये बाजार भी भारत में संभावनाएं देख रहा है। आईपीएल से प्रेरणा लेकर दूसरे खेलों में ऐसी लीग शुरू करने की योजना बनाई जा रही है या इसे मूर्त रूप दिया जा रहा है। बड़े कॉरपोरेट भी इसमें मोटा पैसा लगा रहे हैं। भारत के बाजार में अब तक क्रिकेट ही पसंदीदा है, पर जिस तरह खेलों में नई अंगड़ाई आ रही है, उसके मद्देनजर बाजार अब दूसरे खेलों को भी ऊपर उठाने में जुट गया है। कई और खेल तेजी से उभर रहे हैं, इसमें मोटर स्पोर्ट्स, बॉक्सिंग, फुटबॉल और बास्केटबॉल सभी हैं। एक जमाना था, जब 40 व 50 के दशक में टीवी प्रसारण शैशवकाल में था और अमेरिका में टीवी सेट नहीं बिकते थे तो टीवी कंपनियों ने खेल मैचों का लाइव प्रसारण करके टीवी सेटों की बिक्री में क्रांति ला दी थी। तब खेलों के सहारे टीवी ने जिंदगी पाई, अब टीवी के सहारे खेल जिंदगी पा रहे हैं।

बहरहाल, आईपीएल-5 का रोमांच इंतजार कर रहा है। मौजूदा आईपीएल का ओवरऑल खर्चा करीब 450 करोड़ के आसपास है, इसके साथ 900 करोड़ का ब्रॉडकास्ट कारोबार व सैकड़ों करोड़ का स्पांसरशिप कारोबार भी घूमने की उम्मीद है। माना जा रहा है कि खेल आने वाले समय में एक लाख करोड़ की इंडस्ट्री में तब्दील होने वाले हैं। तब आईपीएल जैसी दर्जनों लीग आपके आसपास चकाचौंध फैलाएंगी। निश्चित रूप से इसे खेलों का विकास कह सकते हैं, पर हर विकास की कीमत भी होती है, जिसे आईपीएल के विकास व टीम इंडिया के साइड इफेक्ट्स के तौर पर देख सकते हैं।

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