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रुक सकती है जंगल की आग

वैसे जंगल की आग कोई नई चीज नहीं है। कहते हैं कि इसका इतिहास लगभग 4,000 साल पुराना है। जबसे पेड़-पौधों ने वनों का स्वरूप लेना शुरू किया। पहली वनाग्नि, जिसके प्रमाण उपलब्ध हैं, लगभग 3,900 साल पहले काबरेनिकेट्स युग में आई थी। जंगलों में आग लगाकर उस जगह खेती करने का इतिहास तो इससे भी पुराना है। झूम खेती जैसी इस तरह की कई परंपराएं आज भी पूरी दुनिया में दिख जाती हैं। भारत में पुरातत्व अध्ययन के आधार पर पता चलता है कि करीब 2,000 साल पहले मध्य भारत में ऐसी आग की पहली घटना घटी थी। 
हिमालयी वनों में आग की ऐसी घटनाएं अक्सर होती रहती हैं। पिछले दस साल के ही आंकड़े अगर उठा लिए जाएं, तो इससे जो जान-माल का नुकसान हुआ है, वह बेहिसाब है। ऐसे किसी भी आकलन में वन्य जीवों का तो हिसाब जुड़ता ही नहीं, क्योंकि यह आकलन तो तब संभव होता, जब हमारे पास वन्य जीवों की संख्या की सही जानकारी होती। हर वर्ष बढ़ते तापमान के साथ आग का खतरा बढ़ा है। जिस वर्ष शीतकालीन वर्षा का अभाव होता है, उस वर्ष ऐसी आग प्रचंड रूप धारण करती है। सन 1993 और 2005 से 2009 के बीच ऐसे कई वर्ष रहे, जब जंगल की आग ने हजारों हेक्टेयर वनों व उनमें पलते पशु-पक्षियों को लील लिया। आग के कारणों में यह मानकर चला जाता है कि दो-तिहाई आग की घटनाएं मानव जनित होती हैं और एक-चौथाई प्राकृतिक कारणों से। असल में ग्रीष्म ऋतु की शुरुआत में पेड़-पौधे अपने पुराने पत्तों से मुक्त होकर नई कोंपलों को जन्म देते हैं। इन झरते पत्तों से वन में आग लगने का भय बना रहता है। मार्च-अप्रैल में पतझड़ व बढ़ते खर-पतवार, खास तौर से लेंटाना आदि के कारण आग का खतरा बढ़ जाता है। एक सर्वेक्षण के अनुसार, सेंट्रल हिमालय में 2.1 से लेकर 3.8 टन प्रति हेक्टेयर पत्ते झड़ते हैं। इनमें से 82 प्रतिशत सूखी पत्तियां ही होती हैं। इसी तरह से अकेले लेंटाना जैसी विषाक्त झाड़ियां, जो 40 लाख हेक्टेयर वन-भूमि पर फैल चुकी हैं, आग को भड़काने में पूरा योगदान करती हैं।

पिछले पचास वर्षों में वनों में आग की घटनाएं खूब बढ़ी हैं। खासकर जब से वनों का स्थानीय निवासियों से रिश्ता समाप्त हुआ है। पहले गांवों में परंपरा थी कि वनों में आग लगते ही पूरा गांव एकजुट होकर आग बुझाने जाता था। आज ये भावनाएं खत्म हो गई हैं। वन-नीति की यह सबसे बड़ी कमी रही है कि इसमें गांव की भागीदारी नगण्य है और यही कारण है कि वनों को सरकारी संपदा समझकर निवासी वनों से बहुत दूर जा चुके हैं। अब वे ऐसी किसी पहल में भागीदारी नहीं करते। पहले गांवों की महिलाएं अपने मवेशियों के बिछौने के रूप में वनों की पत्तियों का प्रयोग करती थीं। बाद में मवेशियों के मल-मूत्र के साथ मिलकर इनकी एक अच्छी खाद बनती थी। इस परंपरा को हमने बढ़ावा ही नहीं दिया। अब ये पत्तियां जंगल में ही पड़ी रहती हैं और आग का कारण बनती हैं। आज भी पुराने तरीके को अपनाया जाए, तो वनाग्नि पर अंकुश लग सकता है। साथ ही गांवों की खाद की जरूरत भी पूरी हो सकती है। चीड़ की पत्तियों को कोयले में परिवर्तित कर जलाऊ लकड़ी के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। इस तरह के सूखे पत्तों का स्थानीय उपयोग जहां रोजगार के अवसर पैदा करेंगे, साथ ही गांव में वनों के प्रति नया लगाव भी पैदा होगा।

ऐसा नहीं है कि जंगल की आग रोकने के लिए सरकार की तरफ से कोशिश नहीं होती। देहरादून के वन सर्वेक्षण संस्थान ने भारतीय सुदूर अतरिक्ष केंद्र के साथ मिलकर वनों में आग लगने की सूचना प्राप्त कर तत्काल स्थानीय व राज्य प्रशासन को सूचित करने की व्यवस्था की है। साल 2004 से प्रभावी यह योजना किसी भी राज्य के वन में लगी आग की सूचना दे सकती है। लेकिन हम इसका कितना लाभ उठा पाए, यह एक अलग विषय है। सर्वेक्षण संस्थान के अधिकारियों का मानना है कि यह एक ऐसा रास्ता है, जिससे हम प्रभावी कदम उठा सकते हैं। वनाग्नि की गंभीरता को देखते हुए इसे राष्ट्रीय आपदा प्राधिकरण ने आपदा का दर्जा तो दे दिया है, पर इसका कहीं ज्यादा प्रभाव दिखाई नहीं देता।

असल में, इस मुद्दे पर बहुत गंभीरता सामने नहीं आती और सब कुछ राम भरोसे ही छोड़ दिया जाता है। मसलन, अगर आग ने बड़ा रूप धारण कर लिया, तो विभाग इंद्र देवता की कृपा पर निर्भर रहता है। सच तो यह है कि हमारे पास न आग लगने से पहले और न ही आग लगने के बाद के लिए कोई रणनीति या उचित प्रबंध है। वैसे आग लगने की आशंकाओं को सही तरह से पहचाना जा सकता है। उदाहरण के लिए, अगर हम बढ़ते तापमान पर लगातार दृष्टि रखें, साथ में पतझड़ की मात्र व मिट्टी में उपलब्ध नमी का विश्लेषण कर लें, तो उस स्थान विशेष में आग की आशंका का पूर्वानुमान लगाया जा सकता है। एक बार जानकारी प्राप्त होने पर स्थान विशेष के लिए जरूरी कदम उठाए जा सकते हैं। मगर इस तरह की सूचनाएं तभी लाभप्रद होंगी, जब स्थानीय निवासियों की इनमें भागीदारी होगी।  

इसके बिना वर्तमान व्यवस्था कितनी भी चौकस क्यों न हो, वनाग्नि को रोकने में हम अक्षम ही रहेंगे। वन विभाग के लाख प्रयत्न के बाद भी बिना जन सहयोग के इस आग पर अकुंश नहीं लगाया जा सकता। एक वनरक्षक या अग्निरक्षक 300 हेक्टेयर में लगी आग को भला कैसे रोक सकेगा? जब तक अन्य सहायता पहुंचेगी, तब तक जंगल जलकर राख हो चुके होंगे। इसलिए हमें दो स्तरों पर कार्य करने की आवश्यकता है। सही सूचना पर आधारित प्रभावी तंत्र तैयार करना और सभी संबंधित विभागों के समन्वय पर आधारित रणनीति बनाना। स्थानीय लोगों के साथ इस सूचना व तंत्र की भागीदारी ही इस तरह की आपदाओं पर संतोषजनक अंकुश लगा सकती है। निवासियों की भागीदारी तभी संभव होगी, जब उन्हें वनों की रक्षा के प्रति सिर्फ जागरूकता के दायित्वों को महसूस न कराकर वनों के लाभ में हिस्सेदार बनाया जाए, ताकि यह मात्र सरकार या वन विभाग की ही चिंता न रहकर, गांव और घर की चिंता बने।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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