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जितने विभाग, उतने ही हैं गरीबी के मापदंड

गरीब सिर्फ गरीब नहीं होता। उसकी परिभाषा होती है। उसकी गरीबी तय करने का फॉर्मूला होता है। इस परिभाषा और फॉर्मूले के गणित के साथ ही उसकी एक राजनीति भी होती है। दिक्कत सिर्फ इतनी ही नहीं है, दिक्कत यह है कि हमारे देश में एक साथ गरीबी की कई परिभाषाएं और फॉर्मूले हैं। किसी जगह उसे मापने का पैमाना कुछ और है, तो किसी अन्य जगह पर कोई दूसरा। इतना ही नहीं, कहीं गरीब को गरीब कहा जाता है, तो कहीं वह आर्थिक रूप से कमजोर तबके का सदस्य होता है। ताजा विवाद योजना आयोग के आंकड़ों को लेकर है। इसके हिसाब से शहरों में 29 और गांवों में 23 रुपये तक रोज खर्च करने वाला व्यक्ति गरीब है। इसका मतलब हुआ कि पांच सदस्यों का परिवार यदि शहरों में प्रतिवर्ष 52,925 और गांव में 41,975 रुपये खर्च करता है, तो वह गरीब नहीं है। इस आकलन और दूसरे आकलनों में फर्क सिर्फ इतना है कि इसमें व्यय को गरीबी का आधार माना गया है, जबकि अन्य जगह गरीबी को परिवार की आमदनी से तय किया जाता है।

बीपीएल यानी गरीबी की रेखा से नीचे की जनगणना में 10 हजार रुपये प्रतिमाह तक की आय वाले परिवारों को गरीब माना जा रहा है। बशर्ते की परिवार के पास लैंडलाइन फोन, रेफ्रिजरेटर, पक्का मकान, सरकारी नौकरी, टू व्हीलर, ढाई एकड़ से अधिक जमीन नहीं हो। ओबीसी आरक्षण के तहत 4.5 लाख रुपये सालाना आय वाले परिवारों को गरीब माना गया है। सरकार इसे अब नौ लाख करने की तैयारी में है। मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने आर्थिक रूप से कमजोर बच्चों के लिए पेशेवर शिक्षा ऋण में ब्याज सब्सिडी योजना शुरू की है, जिसमें 4.5 लाख रुपये तक की आय वालों को गरीब माना गया है।

शिक्षा के अधिकार कानून के तहत निजी स्कूलों में 25 फीसदी सीटें गरीब बच्चों के लिए तय की गई हैं। लेकिन हर राज्य ने गरीबी की परिभाषा अपने-अपने हिसाब से तय की है। दिल्ली में एक लाख रुपये तक की सालाना आय वालों को इस कानून के तहत गरीब माना गया है। इसी प्रकार, सामाजिक न्याय व अधिकारिता मंत्रालय ने विकलांग, किंतु आर्थिक रूप से कमजोर छात्रों की उच्च शिक्षा के लिए जो योजनाएं चला रखी हैं, उनमें तीन लाख तक की आय वालों को गरीब माना है। अनुसूचित जातियों के छात्रों के लिए स्कॉलरशिप के लिए इसी मंत्रालय ने आय की सीमा दो लाख रखी है, जबकि यूजीसी समेत कुछ केंद्रीय विश्वविद्यालय गरीब अनुसूचित जाति व जनजाति के कमजोर छात्रों को स्कॉलरशिप देते हैं। इसके लिए आय का मापदंड 60 हजार रुपये सालाना तय किया गया है। स्वास्थ्य मंत्रालय गरीबों को इलाज के लिए आर्थिक सहायता प्रदान करता है। वह 75,000 रुपये से कम सालाना आय वालों को गरीब मानता है। शायद इस देश में जितनी गरीबी है, उससे कहीं ज्यादा है उसे आंकने की नीतियों की दरिद्रता।

 

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