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व्यर्थ का विवाद

सेना को लेकर एक अंग्रेजी अखबार में छपी खबर पर जो हंगामा चल रहा है, उससे बचा जा सकता था। इस खबर के अनुसार, हिसार और आगरा से दो फौजी टुकड़ियां पिछली 16 जनवरी की रात को अचानक दिल्ली की ओर चल पड़ीं और दिल्ली के सीमावर्ती इलाके में पहुंच गईं। इस बात की सूचना सरकार को नहीं थी और इसने उच्चस्तरीय हलकों में खलबली मचा दी। ये फौजी टुकड़ियां कुछ देर बाद अपने-अपने ठिकानों पर वापस चली गईं। इस बात से हलचल मचने की वजह यह भी थी कि 16 जनवरी को ही थल सेनाध्यक्ष जनरल वी के सिंह ने सुप्रीम कोर्ट में अपनी जन्मतिथि पर विवाद के मामले में याचिका डाली थी। सेना का कहना है कि यह एक नियमित अभ्यास था, जो यह देखने के लिए किया गया था कि धुंध के मौसम में सेना कितनी तेजी से तैनात की जा सकती है और इसमें किन-किन गड़बड़ियों की आशंका है। सेना का कथन विश्वसनीय लगता है और यह भी लगता है कि मूल समस्या संवाद की कमी की थी। इस बात की आशंका आजादी के 65 साल बाद अब नहीं है कि यहां किसी किस्म का सैनिक तख्तापलट हो सकता है। आजादी के तुरंत बाद ही हैदराबाद और कश्मीर में भारतीय सेना को कार्रवाई करनी पड़ी थी और एक पेशेवर अनुशासित सेना की तरह इसने नागरिक शासन के निर्देशों के मुताबिक कार्रवाई की थी। भारतीय लोकतंत्र के तमाम संस्थान कई मुश्किलों को झेलकर इतने मजबूत हो गए हैं कि वे अपने रास्ते से डिगेंगे या उन्हें नष्ट किया जा सकता है, इस बात की आशंका पूरी तरह खत्म हो गई है। जनरल सिंह ने अपनी जन्मतिथि के विवाद को जिस हद तक खींचा और पिछले दिनों भ्रष्टाचार के मुद्दे पर जिस तरह मोर्चा खोला, उनसे कुछ हलचल तो हुई, लेकिन यह आशंका तब भी नहीं थी कि लोकतांत्रिक सरकार और सेना के रिश्तों में कोई बड़ा परिवर्तन हो सकता है। इसलिए अगर कुछ सरकारी हलकों में 16 जनवरी की रात कुछ संदेह और हलचल का माहौल बना भी, तो वह अकारण था। सेना से किसी किस्म की ज्यादती की आशंका का कोई आधार नहीं है।

यह खबर भी ऐसा नहीं कहती कि कोई षड्यंत्र हुआ था। उसका कहना यह है कि सरकार और सेना के बीच कुछ अविश्वास और संवादहीनता की वजह से ही यह स्थिति पैदा हुई। लेकिन यह खबर इतनी सनसनीखेज तो है ही कि प्रधानमंत्री को इस पर बयान देना पड़ा और रक्षा मंत्री एके एंटनी को प्रेस कांफ्रेंस करके सफाई देनी पड़ी। मूल समस्या यह है कि जमाने के साथ कई चीजें बदल जाती हैं, उसी तरह सैनिक अनुशासन के मायने भी बदल जाते हैं। एक लोकतांत्रिक समाज के परिपक्व होने का असर सेना पर भी होता है, लेकिन इसका अर्थ अनुशासन की कमी नहीं होता। अगर जनरल सिंह ने भ्रष्टाचार का मुद्दा न उठाया होता, तो भी सेना और रक्षा प्रतिष्ठान में भ्रष्टाचार की खबरें आती ही रहतीं। इसका अर्थ यह नहीं है कि सेना अपनी मर्यादा भूल गई है या उसके अनुशासन का पतन हुआ है, बल्कि एक परिपक्व लोकतंत्र में ये बातें स्वाभाविक ही हैं। 1962 के युद्ध को छोड़ दें, तो उसके बाद हर युद्ध में भारतीय सेना ने जीत हासिल की है और उसे किसी अन्य मुश्किल काम में लगाया गया, तो वह वहां भी सफल रही है। किसी भी संगठन की तरह सेना में भी कुछ कमियां हैं और सुधारों की गुंजाइश भी है, लेकिन इन सबके बावजूद यह कहा जा सकता है कि भारतीय गणराज्य के तहत अपना कर्तव्य निभाने में हमारी सेना सक्षम है। कुछ संवाद और परस्पर विश्वास की कमी इस प्रकरण में देखने में आई। उम्मीद है, इससे सीख लेकर पूरे तंत्र को दुरुस्त किया जाएगा।

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