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जरदारी का हिन्दुस्तान दौरा

क्या किसी पाकिस्तानी सदर का हिन्दुस्तान दौरा निजी रह सकता है, भले ही वह ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की पाक दरगाह की जियारत से ही जुड़ा क्यों न हो? इसका जवाब नहीं में है, क्योंकि सदर जरदारी वहां डॉ. मनमोहन सिंह से मुलाकात करेंगे। इतवार को नई दिल्ली में वह हिन्दुस्तानी वजीर-ए-आजम के साथ दोपहर के खाने पर मिलेंगे। बहरहाल, सदर बनने के बाद जरदारी पहली बार हिन्दुस्तान जाएंगे। साल 2005 में जनरल मुशर्रफ के दौरे के बाद यह किसी पाकिस्तानी सदर का पहला हिन्दुस्तान दौरा होगा। 2005 में ‘क्रिकेट डिप्लोमेसी’ के तहत जनरल मुशर्रफ हिन्दुस्तान गए थे। तो क्या हमें इस बैठक को लेकर ज्यादा उत्साहित होना चाहिए? गुजरे कुछ सालों में हिन्दुस्तान और पाकिस्तान के आला नुमाइंदों के बीच कई मुलाकातें हुई हैं, पर वे कोई खास असर नहीं छोड़ पाईं। यूसुफ रजा गिलानी और हिन्दुस्तान के वजीर-ए-आजम अलग-अलग मौकों पर कम से कम चार बार मिल चुके हैं। मोहाली में वर्ल्ड कप सेमीफाइनल में उनकी मुलाकात हुई थी। थिंपू में सार्क जलसे के दौरान दोनों आमने-सामने हुए। मालदीव में भी दोनों के बीच गुफ्तगू हुई। और हाल ही में सियोल में गिलानी ने डॉ. सिंह से मुलाकात की थी। लेकिन इन मुलाकातों से क्या हुआ? बस ठिकाने बदलते रहे और पुरानी बातें होती रहीं। दोनों मुल्कों के रिश्तों में कोई खास तरक्की नहीं हुई। सरक्रीक, वीजा पॉलिसी को आसान करने और कल्चरल रिश्तों में गरमी लाने जैसे छोटे मसलों पर भी कोई खास बात नहीं बनी। हालांकि यह मुलाकात एक मौका तो है ही। डॉ. सिंह इसे खास बना सकते हैं। वह पाकिस्तान आने का एलान कर सकते हैं। उनका इस्लामाबाद दौरा काफी वक्त से रुका हुआ है। मनमोहन सिंह पाकिस्तान के साथ बेहतर रिश्तों के हिमायती माने जाते हैं। हालांकि इसके लिए उन्हें कट्टरपंथियों की मुखालफत का सामना करना पड़ सकता है। लेकिन यही वह मौका है, जब प्रधानमंत्री सिंह घरेलू सियासी मजबूरियों से ऊपर उठकर कुछ कदम उठा सकते हैं और दोनों मुल्कों के रिश्तों में सुधार लाकर दक्षिण एशिया को सुखद अहसास दे सकते हैं।
द डॉन, पाकिस्तान

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