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लोक भाषाओं के दस्तावेजीकरण जरूरी

कार्यशाला हिन्दुस्तान प्रतिनिधि पटना। लोग रहेंगे तभी भाषा रहेगी। लोकभाषाओं की संख्या 1971 के पूर्व तक 1652 रिकॉर्डेड है, जबकि सन् 71 के बाद इसकी संख्या 150 पर आ गई। इसका मुख्य कारण रहा कि सरकार की नई नीति, जिसके तहत यह कहा गया कि जिस भाषा को 10 हजार से कम लोग बोलते हैं, उसकी गणना नहीं होगी।

घुमन्तू लोगों की भाषा में इंडो-आर्यन समूह की भाषा की तरह विशेषता है फिर भी वह उपेक्षित है। प्रख्यात भाषाविद् ग्रियर्सन के बाद इस दिशा में कोई और काम नहीं किया गया है। उस समय की परिस्थितियां दूसरी थीं। आज की परिवर्तित परिस्थितियों में आवश्यकता है कि लोकभाषाओं का दस्तावेजीकरण किया जा सके।

यह बातें बड़ादा स्थित भाषा रिसर्च सेन्टर की राष्ट्रीय संयोजक डॉ. गणेश देवी ने मंगलवार को एक कार्यशाला में कहीं। एक दिवसीय कार्यशाला का आयोजन पटना विश्वविद्यालय के प्राक् परीक्षा प्रशिक्षण केन्द्र में भाषा रिसर्च सेंटर, बड़ादा एवं पीपुल्स लिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ इंडिया के तत्वावधान में किया गया था जिसका विषय था ‘लोकभाषाओं के दस्तावेजीकरण’।

कार्यशाला में भाषाविद् ओमकार कौल ने बताया कि लोकभाषाओं के दस्तावेजीकरण के लिए उन भाषाओं पर लिखने वाले लोगों की पहचान आवश्यक है। उन्होंने दस्तावेजीकरण के लिए एक प्रारूप प्रस्तुत किया, जिसमें बोली का नाम, क्षेत्र, इतिहास तथा भाषाई विशेषताओं को रेखांकित किया गया था।

बिहार अनुसूचित जाति के अध्यक्ष श्री विद्यानंद विकल ने कहा कि लोकभाषाओं को बचाने की दिशा में दस्तावेजीकरण एक सराहनीय कदम है। पटना विवि के डॉ़ पुष्कर देव ने कहा कि भोजपुरी एक अंतरराष्ट्रीय भाषा होते हुए भी आठवीं अनुसूची में जगह नहीं ले सकी है। लोकभाषाओं का यह दस्तावेजीकरण भोजपुरी सहित अन्य भाषाओं के लिए भी आवश्यक है।

मगही के लेखक व पूर्व विधान पार्षद् श्री बाबूलाल मधुकर ने भी कार्यशाला में विचार रखे। बज्जिका भाषा के लेखक सतीश पटेल ने कहा कि ‘बज्जिका’ एक भाषा है पर सरकार ने आज तक इसके लिए कोई अकादमी नहीं खोली। प्राक् परीक्षा प्रशिक्षण केन्द्र के निदेशक प्रो़ रमाशंकर आर्य ने सभी प्रतिभागियों का स्वागत किया तथा लोकभाषाओं के संरक्षण के लिए सभी को अपना योगदान देने के लिए प्रोत्साहित किया।

कार्यशाला के समापन सत्र में भाषा रिसर्च सेंटर के महेश कुमार ने सभी प्रतिभागियों का धन्यवाद ज्ञापन किया। इस अवसर पर उपस्थित विद्वानों में प्रो़ आरएनपी सिन्हा, एमपी सिन्हा, मगही अकादमी के अध्यक्ष कविजी, रमेश मोहन शर्मा, कुमार नयन, डॉ़ आऱ पी़ सिंह, सुरेन्द्र स्निग्ध, डॉ़ एम़ रहमान, डॉ़ जियाउल हसन, मुसाफिर बैठा आदि उपस्थित थे।

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