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दया याचिका पर खुद राष्ट्रपति करें फैसला

दया याचिकाओं पर फैसला लेने के लिए सरकार की सलाह पर राष्ट्रपति के निर्भर होने का सवाल उठाकर सुप्रीम कोर्ट ने नई बहस छेड़ दी है। शीर्ष अदालत ने कहा है कि दया याचिकाएं राष्ट्रपति को भेजी जाती हैं। राष्ट्रपति उन्हें सरकार के पास भेज देते हैं, जहां उन्हें 5-10 वर्षों तक लंबित रखा जाता है।

यह एक तरह से हाईकोर्ट में दूसरी अपील दायर करने की तरह है। सुप्रीम कोर्ट ने जब अंतिम फैसला सुना दिया है तो सरकार का दोबारा विचार करने का कोई अर्थ नहीं है। दया याचिका पर फैसला सीधे राष्ट्रपति को ही लेना चाहिए।

जस्टिस सिंघवी की पीठ ने कहा कि ऐसे मामलों में राष्ट्रपति को सरकार की सलाह का इंतजार नहीं करना चाहिए। यह ठीक है कि राष्ट्रपति मंत्रिमंडल की सलाह से फैसला लेता है। लेकिन दया याचिका पर राष्ट्रपति को उद्देश्यपरकता के साथ अपनी बुद्धि और विवेक का इस्तेमाल करते हुए फैसला करना चाहिए। केहर सिंह के मामले में तय किया जा चुका है कि दया याचिका पर राष्ट्रपति तीन माह में फैसला लें। फिर भी 10-10 वर्षों तक दया याचिकाएं लंबित रहती हैं। मामले की सुनवाई जारी है। कोर्ट ने अफजल गुरु का उदाहरण दिया, जिसकी दया याचिका पर दिल्ली सरकार चार साल तक बैठी रही। मीडिया में मामला आने के बाद फाइल गृह मंत्रालय को भेजी गई।

 

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