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तिब्बत में आत्मदाह की राजनीति

उसने उस ग्रामीण मठ के तीन चक्कर लगाए, जहां उसका बचपन गुजरा था, फिर वह साइकिल से शहर आ गया। अपने दोस्तों के साथ साधारण खाना खाने के बाद 22 साल का लोबसंग जमयांग बाथरूम गया। जहां उसने अपने शरीर पर गैसोलीन छिड़ककर आग लगा ली। वह दौड़ता हुआ पूर्वी तिब्बत के शहर नागबा के मुख्य इलाके में कीर्ति मठ के सामने पहुंचा और चीन के कब्जे से तिब्बत की आजादी और दलाई लामा की वापसी के नारे लगाने लगा। भारी सुरक्षा इंतजाम वाले इस इलाके में पुलिस ने उसे पहले गिराया और फिर कील लगे डंडों से उसकी पिटाई की। यह पूरी कहानी मौका-ए-वारदात के उन गवाहों ने बताई, जो इस समय भारत के धर्मशाला में शरणार्थी बनकर रह रहे हैं।

जमयांग तिब्बत के 33 से भी ज्यादा उन नौजवानों में एक था, जिन्होंने पिछले कुछ समय में चीनी शासन के खिलाफ विरोध जताने के लिए आत्मदाह कर लिया। तिब्बतियों का कहना है कि चीन जिस तरह से उनकी संस्कृति को खत्म करने, उनकी आवाज को दबाने और उनकी पहचान को नष्ट करने का काम कर रहा है, ये आत्मदाह उसकी एक प्रतिक्रिया भर हैं। कहा जाता है कि साल 2008 में इस इलाके में हुए प्रदर्शन के बाद से चीन का दमन कुछ ज्यादा ही तेज हो गया है। उस साल वसंत में बीजिंग में होने वाले ओलंपिक खेलों के खिलाफ प्रदर्शन शुरू हो गए थे। इसके बाद हुई कार्रवाई में सैकड़ों लोग मारे गए और हजारों गिरफ्तार हुए थे। मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि वह प्रतिक्रिया बर्बर थी।

इस बीच वहां तिब्बतियों को उनके परंपरागत घरों से हटाकर अपार्टमेंट्स या माचिस की डिबिया जैसे घरों में बसाने का अभियान तेज हो गया है। इसके अलावा स्कूली शिक्षा से तिब्बती भाषा को हटाकर उसकी जगह चीनी भाषा को पढ़ाई का माध्यम बनाया जा रहा है। इसके साथ ही तिब्बत के बौद्ध मठों पर सरकार का नियंत्रण भी बढ़ गया है। ये मठ यहां के लोगों के धार्मिक व सांस्कृतिक जीवन के केंद्र होते हैं। इस सबका एक नतीजा यह हुआ है कि लोगों में तिब्बती राष्ट्रीयता और पहचान की भावना ज्यादा पुख्ता हो गई है। अब हफ्ते में एक दिन यहां के लोग परंपरागत तिब्बती परिधान पहनते हैं, सिर्फ तिब्बती भाषा में ही बात करते हैं और चीन के नागरिकों द्वारा चलाई जा रही दुकानों से खरीदारी नहीं करते।

कीर्ति मठ के एक युवा भिक्षु तापे ने फरवरी 2009 में यहां आत्मदाह किया था, उसके हाथ में घर में ही बनाया हुआ तिब्बत का झंडा था और दलाई लामा की तस्वीर थी। पुलिस ने उसे गोली मार दी। हालांकि चीनी प्रांत साइचुन में पड़ने वाले इस मठ में 1997 से ही काफी सख्ती बरती जाती रही है। भिक्षुओं को देशभक्ति की शिक्षा दी जाती है। जिस किसी भिक्षु के उत्साह में जरा-सी भी कमी पाई जाती है, उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है। यहां से भारत भाग गए भिक्षु लोबसांग येशी का अब भी अपने दोस्तों से संपर्क है। वह बताते हैं कि ल्हासा के तीन बड़े मठ तिब्बती बौद्ध धर्म के केंद्र हैं, लेकिन अब वे पर्यटन केंद्र भर रह गए हैं। बस कीर्ति मठ ही ऐसा है, जो थोड़ा-बहुत संघर्ष कर रहा है। चीनी प्रशासन इसे अपने नियंत्रण के लिए सबसे बड़ा खतरा मानता है। इसलिए वह इसे खत्म करना चाहता है।

वैसे प्रतिरोध कैसे किया जाए, इस बात पर भिक्षु एकमत नहीं हैं। सांस्कृतिक क्रांति की मार झेल चुके पुराने भिक्षुओं को वह दौर याद है, जब ज्यादातर मठ तबाह कर दिए गए थे। वे जानते हैं कि चीनी क्या कर सकते हैं। इसलिए वे सहयोग की बात करते हैं, जबकि नौजवान चाहते हैं कि इसका प्रतिरोध किया जाए। पिछले साल मार्च में जब आत्मदाह की दूसरी घटना घटी, तो चीन की प्रतिक्रिया नाटकीय थी। उसने मठ को सील कर दिया और सभी 300 भिक्षुओं को गिरफ्तार कर लिया। गांव वाले जब विरोध के लिए आगे आए, तो उन्हें पीटा गया और ट्रकों में भरकर ले जाया गया। आत्मदाह करने वाले भिक्षु के शिक्षक और दो दोस्तों को दस साल से भी ज्यादा की सजा दे दी गई। लेकिन इससे आत्मदाह की घटनाएं कम होने की बजाय बढ़ ही गईं। नागबा में इसके बाद जो 20 आत्मदाह हुए, उन्हें करने वाले ज्यादातर या तो भिक्षु थे या वे पहले भिक्षु रह चुके थे।  दो भिक्षुणियों और दो आम तिब्बती लोगों ने भी आत्मदाह किया।  इस हादसे से गुजरे 26 वर्षीय चरवाहे सुग्ने कयाब ने तुरंत भारत का रुख किया। उसका कहना है कि यह इलाका अब पूरी तरह सेना की छावनी बन चुका है। कयाब और दूसरे तिब्बती शरणार्थियों का कहना है कि जिन्होंने आत्मदाह किया, वे उनके नायक हैं। वे मानते हैं कि आत्मदाह इस बात की अभिव्यक्ति है कि अब हम चीनी शासन के मातहत नहीं रह सकते। वे यह भी मानते हैं कि यह दलाई लामा के ‘मध्य मार्ग’ की नाकामी भी है। वह पिछले दो दशक से चीन से बातचीत के जरिये समस्या को सुलझाने की कोशिश कर रहे हैं। दूसरी तरफ, आत्मदाह पर चीन की प्रतिक्रिया यह है कि उसने इसका सारा आरोप दलाई लामा के मत्थे मढ़ा है। चीन सरकार की एक वेबसाइट ने हाल ही में उन पर आरोप लगाया कि वह तिब्बत में नाजी नीतियां लागू करना चाहते हैं और जातीय अलगाव व टकराव की एक दीवार खड़ी करना चाहते हैं।

दलाई लामा का कहना है कि वह किसी तरह से आत्मदाह का समर्थन नहीं करते। लेकिन वह इसे लेकर चल रही बहस में शामिल नहीं हैं, क्योंकि पिछले साल उन्होंने राजनीति से संन्यास ले लिया था। अब लोकतांत्रिक ढंग से चुनी गई तिब्बत की निर्वासित सरकार का सारा काम उनकी जगह हॉर्वर्ड के प्रोफेसर रह चुके लोबसंग संगे देख रहे हैं। धर्मशाला में रहने वाले तिब्बती समुदाय के लिए जारी एक बयान में संगे ने ऐसी अतिवादी प्रतिक्रिया से बचने की अपील की है। चीन की सांस्कृतिक क्रांति के बाद धर्मशाला ने ही तिब्बत की याद को जीवित रखा था, पर अब जब तिब्बत के लोगों ने प्रतिरोध की लगाम खुद थाम ली है, तो धर्मशाला मूकदर्शक बन गया है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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