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नन्ही सी नाक में नौ सेर की नथनी

लकदक मैदान में मौलाना पेड़ तले खड़े अंगुलियों पर कुछ गिन रहे थे। मैंने पूछा, इनकम टैक्स जोड़ रहे हो? ठंडी सांस भरकर बोले, ‘टैक्स? पुराने तहमद-कुरते और पेट में पड़ी लौकी पर भी टैक्स? बासी भात में भी खुदा का साझा? पर सरकार तो किसी तरफ से निचोड़ ही लेगी। इसे कहते हैं, फटे पाजामे में गोटे का नाड़ा। बस देखते जाइए।’

दाढ़ी और माथे का पसीना गमछे से पोंछकर बोले, ‘हमें तो भाई मियां सारा आम-इमली अपने तीन रुपये के पेपर से मिलता है। एक न्यूज उछाली है कि केंद्रीय कर्मचारियों का सात परसेंट डीए बढ़ा। बल्ले-बल्ले। अब खाओ निवाले घी में डुबोकर। ऊंट के मुंह में जीरा आ गया, ऊंट का पेट भर गया। इसे कहते हैं सरकारी दरियादिली। पब्लिक को बिना घी-मक्खन के नहीं देख सकती गवरमेंट। इधर सुना कि पेट्रोल, डीजल, गैस की कीमतें बढ़ रही हैं। बिजली का दाम प्रति यूनिट बढ़ रहा है। दुकानदार बढ़ते डीए के साथ हींग, साबूदाने तक के दाम बढ़ा रहे हैं। देश के बढ़ते विकास में सबको अपना योगदान देना है। यह थोड़े ही कि सिर्फ डीए बढ़े और बाकी चीजें भारतीय क्रिकेट टीम की तरह चुपचाप नाक कटाती रहे। सबको बढ़ना है। डीए सात परसेंट बढ़ा, बाजार सत्तावन परसेंट। यानी नन्ही-सी नाक में नौ सेर की नथनी लटकी रही। रूमाल भर दिया, लंगोटी खींच ली। आपकी कसम भाई मियां, जय हिंद का नारा लगाने को दिल करता है।’ नजले वाली नाक से लीक करती बूंदें गमछे से पोंछकर बोले, ‘सब अपनी दाल-आटे का रोना रोते हैं.., सरकार की गरीबी और मजबूरी कोई नहीं देखता। इस सात परसेंट बढ़ाने के लफड़े में सरकार साढ़े सात हजार करोड़ के लपेटे में आ गई। किस देश के दरवज्जो पर कटोरा लेकर खड़ी होगी? ऐरे-गैरे अरबों डकारकर सीबीआई की क्लीनिक में चले जाएं, पर सरकार को धेले-पाई का हिसाब रखना पड़े है। खैर! अब सात लेकर सत्तावन के बढ़े खर्च का बजट बनाओ मियां। हम तो कहें कि ऐसे बढ़े से अच्छा है कि कम कर दो। पर दूसरे हाथ में थमी कैंची से जेब न काटो। हम दोनों भूत हैं.. भूतपूर्व केंद्रीय कर्मचारी। डीए की खुशी में आधी-आधी चाय लड़ा लें।’

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