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आनंद की राह

गति की शैली और इस गति में लगने वाला बल पथ की स्थिति के अनुसार भिन्न-भिन्न होता है, बदलता रहता है। गति को विभिन्न स्तरों में विभाजित किया जा सकता है, और प्रत्येक स्तर को पार करने के लिए प्रत्येक स्तर पर एक विशेष कार्य शैली के साथ एक विशेष प्रकार की प्रेरणा और बल की जरूरत रहती है। मनुष्य प्रयास कर सकता हैं, किंतु ईश्वर यदि उसके प्रयास से खुश होते हैं, तब वे उनकी सहायता कर देंगे। मनुष्य का कर्तव्य सिर्फ अपने प्रयासों से ईश्वर को खुश रखना है। यदि कोई कर्म संपन्न होता है, तो उसका श्रेय संबंधित साधक को नहीं है, यह श्रेय ईश्वर को देना चाहिए। मनुष्यों को हमेशा उनको खुश करके उनकी कृपा प्राप्त करने की चेष्टा करनी चाहिए। सिर्फ इसी से उनका उद्देश्य पूरा हो जाएगा। उस अंतिम बिंदु की ओर समस्त प्राणशक्ति को लगाकर बढ़ना होगा और यह प्राणशक्ति तुम्हें ईश्वर से मिलती रहेगी। इस स्तर पर तुम्हें अपनी सारी चेष्टाओं के साथ अधिक से अधिक मनुष्यों को इस शुभ कर्मपथ पर अपने साथ लाने का प्रयास करना चाहिए। मनुष्यों को यह हमेशा स्मरण रखना चाहिए कि वे अपने प्रयासों से कुछ भी तरक्की नहीं कर सकते, बल्कि वह ईश्वर की कृपा की बदौलत ही कोई तरक्की कर सकते हैं। यह ईश्वर का दायित्व है कि वे उसे आगे बढ़ने में सहायता करें। ईश्वर ही सिर्फ परमगुरु हैं, कुशाग्र बुद्धि का स्तर है, जहां सभी लक्ष्य, समस्त पदार्थ जगत, सभी आभोग एक बिंदु में समाहित हो जाता है। इस तरह तुम्हें अपने लक्ष्य की ओर अर्थात एक मन बिंदुभूत हो जाता है, कुशाग्र हो जाता है, एकाग्र हो जाता है। यहां कोई आंतरिक क्लेश नहीं, किंतु बाहरी बाधाएं कई अधोगामी शक्तियों के रूप में सामने आ सकती हैं। स्मरण रखना चाहिए कि जो कुशाग्र बुद्धि हैं, आध्यात्मिकता ही जिनका एकमात्र लक्ष्य है, ये अधोगामी शक्तियां उन्हें पराजित नहीं कर सकतीं। यही है आनंद प्राप्ति का पथ।

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  • Web Title:आनंद की राह