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मनोरंजन का खेल

इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) के प्रति अब भी लोगों में उत्साह है, लेकिन हर साल इस उत्साह में कमी आ रही है। इस साल उत्साह में कमी की एक वजह पिछले दिनों भारतीय क्रिकेट टीम का खराब प्रदर्शन है। ऑस्ट्रेलिया और इंग्लैंड में भारतीय टीम की अच्छी-खासी धुलाई हो गई और चैंपियन्स ट्रॉफी में पिछले एकदिवसीय विश्व कप की विजेता भारतीय टीम और उप-विजेता श्रीलंका, दोनों ही फाइनल में नहीं पहुंच पाए। यह भी सच है कि आईपीएल का मुख्य आकर्षण उसके नएपन से जुड़ा था। धीरे-धीरे खेल का यह रूप अपना नयापन और उसके साथ आकर्षण गंवाता जा रहा है। शुरू में हर गेंद पर चौके-छक्के वाला यह खेल बहुत मनोरंजक और उत्तजेक था, लेकिन ऐसी उत्तेजना व चकाचौंध लगातार तो नहीं बनी रहती। इसके बावजूद टी-20 क्रिकेट का व्यावसायिक और आर्थिक पक्ष मजबूत है और इसने कई नौजवान खिलाड़ियों को आर्थिक मजबूती व पहचान दिलवाई है। इसे क्रिकेट का लोकतंत्रीकरण कहें या व्यवसायीकरण, पर आईपीएल ने लोगों की क्रिकेट देखने की आदत बदल डाली है। टी-20 क्रिकेट इंग्लैंड में दर्शकों को स्टेडियम तक लाने के लिए शुरू किया गया था और भारत में आकर इसका इतना बड़ा बाजार बन गया कि किसी ने कल्पना तक नहीं की थी। यह भविष्यवाणी की गई थी कि अब सिर्फ टी-20 और टेस्ट क्रिकेट ही बचेगा, एकदिवसीय मैच खत्म हो जाएंगे। यह भविष्यवाणी अब तक तो गलत साबित हुई है। टी-20 को देखने ज्यादा लोग आते हैं, लेकिन आईपीएल को छोड़ दिया जाए, तो यह सफलता भी कोई उल्लेखनीय नहीं है। चैंपियन्स ट्रॉफी में तो दर्शक बिल्कुल उत्साह नहीं दिखाते, टी-20 विश्व कप उससे थोड़ा ही ज्यादा लोकप्रिय है। वैसे यह कहना पूरी तरह सही नहीं होगा कि आईपीएल के उत्साह में कमी की वजह दर्शकों की बेरुखी है, अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद (आईसीसी) और भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) की गलत नीतियां भी इसके लिए जिम्मेदार हैं। क्रिकेट में बड़े पैमाने पर पैसा आने से ये संगठन कुछ ज्यादा उत्साही हो गए और भूल गए कि खेल के व्यावसायिक दोहन पर ज्यादा ध्यान देने से क्रिकेट नामक उस खेल को नुकसान पहुंच रहा है, जिसकी बदौलत वे यह पैसा कमा रहे हैं।

बीसीसीआई के पीछे अब उस तरह से प्रायोजक नहीं टूट पड़ रहे है, जैसे कुछ वर्ष पहले स्थिति थी। साल में 365 दिन क्रिकेट आयोजन करने और समझदारी से दौरों की योजना न बनाने से दर्शक खेल से मुंह मोड़ने लगे हैं। अगर क्रिकेट का आकर्षण बनाए रखना है, तो उसके मैचों की संख्या कम करनी होगी और साल भर की योजना इस तरह बनानी होगी कि दर्शकों की उत्सुकता बनी रहे। एक बड़ी समस्या यह है कि आईपीएल का बुरा असर नौजवान खिलाड़ियों पर पड़ा है। दौलत और ग्लैमर को संभालना तो उनके लिए मुश्किल हो ही रहा है, नौजवान खिलाड़ियों की तकनीक भी इससे खराब हो रही है। ज्यादातर कोच यह कह रहे हैं कि 19 वर्ष से कम आयु के लड़कों को टी-20 खेलने पर रोक लगनी चाहिए। इंग्लैंड और पाकिस्तान जैसे देशों ने तो आंशिक पाबंदी लगाई भी है। इंग्लैंड के अनुबंधित खिलाड़ी साल भर में कितने मैच खेलेंगे, यह क्रिकेट बोर्ड तय करता है। अगर खिलाड़ी की तकनीक शुरू में ही खराब हो गई, तो फिर वह एक-दो सीजन तो चल जाएगा, लेकिन उसका करियर लंबा चलने की उम्मीद खत्म हो जाएगी। इसका अर्थ यह नहीं कि टी-20 और आईपीएल बंद कर दिए जाएं, लेकिन उन्हें सीमित करने की जरूरत है। ऐसा नहीं हुआ, तो यह सोने के अंडे देने वाली मुरगी को जिबह करने जैसा होगा।

 

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