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औरतों पर अत्याचार

ग्रामीण समाज में महिलाओं को डायन बताकर प्रताड़ित करने की घटना आम है। कई बार तो स्थानीय लोग पीट-पीटकर महिला की हत्या तक कर देते हैं। गांव के पुरुष इसकी सफाई में यह तक कहते हैं कि महिला पर किसी भूत का साया था, इसलिए उसकी आत्मा की शांति के लिए यह सब कुछ किया गया। लेकिन सच यह है कि महिलाओं को डायन बताने की मुख्य वजह पारिवारिक रंजिश और जमीन के झगड़े हैं। हालांकि इस तरह के अपराध में पुलिस कार्रवाई भी करती है और कई बार आरोपियों की धर-पकड़ भी होती है। फिर भी अक्सर देखा गया है कि ज्यादातर मामले रफा-दफा कर दिए जाते हैं। काफी हद तक इसके पीछे पुरुषवादी मानसिकता ही काम करती है। हम यह सोचते हैं कि इस मामले को तूल देने से समाज व गांव की बदनामी होगी। पर उस पीड़िता पर क्या गुजरी होगी, इसका अंदाजा किसी को नहीं होता। हम ये भूल जाते हैं कि महिलाओं की वजह से ही हमारा वजूद है। महिलाओं को डायन बताकर प्रताड़ित करने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई होनी चाहिए।
बबिता गर्ग, बाड़मेर, राजस्थान

पारदर्शिता का सवाल
पिछले एक साल से सिविल सोसायटी का हो-हल्ला जारी है। इस तथाकथित आक्रोश में संसद की आवाज थोड़ी-सी दब गई है। ऐसा प्रतीत होता है कि सरकार लोकपाल कानून लाने के प्रति प्रतिबद्ध है, पर अन्ना हजारे व उनकी टीम का जन-लोकपाल विधेयक, जो देश की उम्मीद है, अब अपनी धार खोता जा रहा है। इसकी वजह खुद अन्ना के सहयोगी हैं। दरअसल, जन-लोकपाल विधेयक का मकसद तो ठीक है, पर आंदोलन कई रास्तों पर चलकर भटक-सा गया है। लोकपाल की नियुक्ति और क्रियान्वयन की पारदर्शिता का सवाल कहीं छूट गया है। आम जनता अब भी पूरी प्रक्रिया से अनभिज्ञ है। एक सशक्त लोकपाल की नियुक्ति की मांग तो समङी जा सकती है, लेकिन उसकी कार्यप्रणाली में पारदर्शिता का स्पष्टीकरण देने में और उससे भ्रष्टाचार के खात्मे की गारंटी लेने में टीम अन्ना विफल रही है। ऐसे में संसदीय प्रक्रिया में वैचारिक मतभेद व देरी स्वाभाविक है। यह बात टीम अन्ना को समझनी चाहिए।
वैभव शर्मा ‘वशिष्ठ’, ईस्ट ऑफ कैलाश, नई दिल्ली

राजनीति और भ्रष्टाचार
देश में भ्रष्टाचार दशकों से है। अब जब पानी सिर के ऊपर से गुजर रहा है, तो हमारी चिंताएं बढ़ गई हैं। वैसे भी, राजनीति की गलियां संकरी व अंधकारमय होती हैं। इसलिए हम राजनीति व भ्रष्टाचार के रिश्ते से अनजान रहे थे। पर अब जनता जाग गई है। वह सभी गलियों की छानबीन कर सकती है। तभी उसकी नजर में उत्तर प्रदेश में सरकारी पैसे से मूर्तियों का बनना भ्रष्टाचार है। अलग-अलग राज्यों में नेताओं द्वारा जो भी अनैतिक आचरण हो रहे हैं, उन्हें जनता नजरअंदाज नहीं कर रही है। बल्कि वह अपने तरीके से ऐसे नेताओं को उनकी सही जगह बता रही है।
गौतम कुमार, मदनगीर, नई दिल्ली

फिर फटाफट क्रिकेट
एक बार फिर आईपीएल की खुमारी छाने लगी है। सीजन-5 ने दस्तक दे दी है और 54 दिनों में नौ टीमों के बीच खिताबी जंग होगी। पैसा, ग्लैमर और क्रिकेट को एक सूत्र में पिरोकर इस फटाफट क्रिकेट को आकार दिया गया। क्रिकेट के इस फॉर्मेट के चलते नए व युवा खिलाड़ियों को खूब मौके मिल रहे हैं, पर जिस देश में क्रिकेट की पूजा होती हो, वहां क्रिकेट को व्यवसाय बनाना कहां तक जायज है? वैसे भी हमारे राष्ट्रीय खिलाड़ी विदेशी दौरों से काफी थक चुके हैं। उन्हें आराम की जरूरत है, पर पैसे के लिए वे मैदान पर आ रहे हैं।
रवींद्र कुमार, गीता कॉलोनी, दिल्ली

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