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थ्रिलर फिल्म से कम नहीं झारखंड के निरंजन की कहानी

करीब एक दशक तक झारखंड के गुमला, लोहरदगा और रांची के बाहरी इलाके के आतंक कहे जानेवाले निरंजन भारती आज पूरी तरह परिवर्तित हो गए हैं। कभी उनके नाम से पुलिस भी डरती थी, लेकिन आज वह सर्वसुलभ हैं। लोग उन्हें सम्मान के साथ देखते हैं।  वह पूरी तन्मयता से बच्चों को पढ़ाते हैं, योगासन करते हैं। कुल मिला कर उनकी कहानी किसी थ्रिलर फिल्म से कम रोमांचक नहीं है।

निरंजन भारती का आतंक 1972 से 1980 तक पूरे इलाके में था। वह डकैतों के गिरोह के सरगना थे। 1972 में पुलिस ने एक मामले में उन्हें जेल भेज दिया। जेल से निकलने के बाद वह पूरी तरह अपराधी बन गए। उनके पिता प्रयाग भारती ने उन्हें फटकारा, तो वग घर छोड़ कर निकल गए। आठ साल में वह कई बार जेल गए। 1980 में छह साथियों के साथ वह गुमला जेल से फरार हो गए। पुलिस के साथ गिरोह की मुठभेड़ हुई, जिसमें निरंजन बच निकले, लेकिन उनके बाकी साथी पकड़े गए।

निरंजन बताते हैं : मुठभेड़ के बाद मैं भाग कर देवघर चला गया। वहां अपने कर्मो के प्रति पहली बार घृणा हुई। मुंडन कराया  और अपने पापों को प्रायश्चित करने का संकल्प लिया। अगले छह साल तक विंध्याचल, इलाहाबाद, हरिद्वार, ऋषिकेष और अन्य तीर्थस्थलों की यात्रा की। 1987 में हिमालय की कंदराओं में महर्षि मेही की शरण में गया और योगाभ्यास शुरू किया। नर्मदा परिक्रमा के बाद गुमला लौटा और वेष बदल कर काली मंदिर में रहने लगा। पुलिस ने शक के आधार पर गिरफ्तार कर लिया, लेकिन कुछ दिन बाद ही गवाह और सबूतों के अभाव में सभी मामलों से बरी हो गया।

उसके बाद से निरंजन ने सिसई को अपना कर्मक्षेत्र बनाया। घर बनाया। खेती-बाड़ी करने लगे। एनपीईजीईएल (राष्ट्रीय प्रारंभिक बालिका शिक्षा कार्यक्रम) से जुड़ गए। सिसई प्रखंड के नगर स्कूल में 20 छात्रओं को वह शिक्षित कर रहे हैं। निरंजन पंचमुखी हनुमान मंदिर निर्माण में सहयोग के साथ योगासन की शिक्षा भी दे रहे हैं। करीब 67 साल के हो चुके निरंजन कहते हैं : जीवन में जितना पाप किया, उसका प्रायश्चित कर रहा हूं। समाज से जो कुछ छीना है, उसे लौटाने की कोशिश कर रहा हूं।

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