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स्वस्थ वृद्धावस्था की ओर

विश्व स्वास्थ्य दिवस के मौके पर इस बार डब्ल्यूएचओ ने पूरी दुनिया का ध्यान वृद्ध लोगों की सेहत की तरफ आकृष्ट किया है। उम्रदराज लोगों का स्वास्थ्य वैसे तो पूरी दुनिया के लिए चुनौती है, लेकिन भारत जैसे विकासशील देशों के लिए यह चुनौती और भी गंभीर है, क्योंकि देश में चिकित्सा तंत्र कमजोर है। बढ़ती आबादी के समक्ष वह पहले से कमजोर बना हुआ है, जिसमें बुढ़ाते लोगों के लिए कुछ अलग से प्रावधान नहीं हैं।

देश में बुजुर्ग
जनगणना महकमे के ताजा आंकड़ों के अनुसार देश में साठ की उम्र पार कर चुके लोगों की आबादी तकरीबन आठ करोड़ होने की संभावना है, जो 2025 तक करीब 15 करोड़ हो जाएगी। बढ़ती उम्र के लोगों को पर्याप्त चिकित्सा सुविधाएं मुहैया कराने के मोर्चे पर हम पीछे हैं। कुछ बड़े सरकारी अस्पतालों में बुजुर्गों के लिए पंजीकरण की अलग लाइन के अलावा सरकार की तरफ से कुछ खास नहीं किया गया है। हाल में प्रधानमंत्री की तरफ से वृद्धावस्था परिषद के गठन की बात कही गई है, जो वृद्धों के स्वास्थ्य और अन्य मुद्दों पर नीतियां तैयार करेगी। यही काफी नहीं है, कुछ बातें नीतिगत स्तर पर भी उठानी होंगी। मसलन, सस्ते स्वास्थ्य बीमा की जरूरत है। वृद्धावस्था का स्वास्थ्य बीमा इतना महंगा होता है कि बुजुर्ग खरीद नहीं पाते। बुजुर्गों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए और उनके लिए सामाजिक सुरक्षा योजनाओं को विस्तारित करने की भी जरूरत है।

वृद्धावस्था चिकित्सा
मौलाना आजाद मेडिकल कॉलेज में कम्युनिटी मेडिसिन के प्रोफेसर जुगल किशोर बताते हैं, ‘हमारे देश में डॉक्टरों की भारी कमी है। वृद्धों की बात करें तो यह समस्या और भी जटिल है। जिस प्रकार बच्चों के इलाज के लिए बाल रोग विशेषज्ञ होते हैं, उसी तरह वृद्धों के लिए वृद्ध रोग विशेषज्ञ होता है। जेरेटिक्स वृद्धों की चिकित्सा प्रणाली है। चिकित्सा विज्ञान में जिस मर्ज को किसी जवान व्यक्ति में सर्जरी या तीव्र क्रिया वाली दवा से ठीक किया जा सकता है, जरूरी नहीं कि वृद्धों में भी इलाज का यही फॉर्मूला अपनाया जाए। लेकिन देश में इसका एमडी कोर्स अभी तक शुरू नहीं हो पाया है। कुछ कॉलेजों ने इसमें डिप्लोमा कोर्स शुरू किए हैं, लेकिन सीटें बेहद कम हैं।’

वृद्धावस्था और जीवनशैली
यह सुझाव दिया जा सकता है कि वृद्धावस्था में शांतिपूर्ण जीवनशैली अपनाएं, पर साठ साल से पूर्व जीवनशैली कैसी रही है, इसका भी वृद्धावस्था में असर पड़ता है। संघर्ष और प्रतियोगिता के दौर में अधिकतर लोग ताउम्र तनाव के दौर से गुजरते हैं। फिर बड़े पैमाने पर लोगों को तंबाकू, सिगरेट, शराब और खराब खान-पान से जुड़ी बीमारियां घेर लेती हैं।  

डॉ. जुगल किशोर के अनुसार, 60 के बाद आमतौर पर रक्तचाप, शुगर की बीमारी शुरू हो जाती है, इसलिए खान-पान पर विशेष ध्यान दिए जाने की जरूरत है। नमक, मीठी वस्तुएं कम से कम लें या न लें। इस उम्र में धमनियों में संकुचन होने लगता है, इसलिए ज्यादा वसा वाली चीजों से परहेज करना चाहिए। भोजन में विटामिन, प्रोटीन, खनिज प्रदान करने वाली सब्जियां अधिक लें। ताजे फलों और फलों के रस का सेवन करें।  साठ की उम्र पार कर चुके लोगों को हर महीने एक बार रक्तचाप और तीन महीने में एक बार शुगर की जांच अवश्य करानी चाहिए। इसके अलावा छह महीने में एक बार ईसीजी कराएं, ताकि पता चले कि दिल दुरुस्त है या नहीं। तीसरे, लीवर, किडनी की कार्यपद्धति की जांच भी साल में एक बार जरूर कराएं। आजकल कई सेंटर बुजुर्ग लोगों के संपूर्ण हेल्थ चेकअप के लिए रियायती पैकेज प्रदान करते हैं।

उपेक्षित वृद्धावस्था
वृद्ध लोग स्वास्थ्य के मोर्चे पर ही नहीं, बल्कि अन्य तरीके से भी उपेक्षित हैं। संयुक्त परिवार टूट रहे हैं और उनकी जगह एकल परिवार ले रहे हैं। शहरों में बुजुर्ग अकेले और अलग-थलग पड़ जाते हैं।  जिन घरों में संयुक्त परिवारों में बुजुर्ग रहते भी हैं तो वहां उनके प्रति परिवार का दृष्टिकोण बदल जाता है।

 

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