DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

म्यांमार की दहलीज पर नई सुबह?

सेना-समर्थित बर्मा सरकार ने उप-चुनावों की निगरानी के लिए अंतत: अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षकों को बर्मा आने की इजाजत दे दी थी। दशकों तक राजनीतिक दमन व उत्पीड़न के शिकार रहे बर्मा में इस फैसले को लोकतंत्र की आहट का एक और सुबूत बताया गया। लेकिन अब भी ऐसी कई वजहें हैं, जो आशंकित करने वाली हैं। देश की मुख्य विपक्षी नेता आंग सान सू की ने भी हाल ही में कहा था, ‘अनेक लोगों ने ऐसा कहना शुरू कर दिया है कि बर्मा के लोकतंत्रीकरण की प्रक्रिया को अब पलटा नहीं जा सकता। ऐसा नहीं है।’

आंग सान सू की के दल ‘नेशनल लीग फॉर डेमाक्रेसी’ (एनएलडी) को चुनावों में हिस्सा लेने की अनुमति, सैकड़ों राजनीतिक बंदियों की रिहाई, मीडिया पर लागू प्रतिबंधों में छूट और देश के भीतर के अनगिनत स्थानीय समूहों के साथ विवादों के निपटारे की कवायद के बाद 45 पार्लियामेंटरी सीटों के लिए ये उप-चुनाव कराए गए हैं। अब यदि इन चुनावों को अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षकों द्वारा स्वतंत्र व निष्पक्ष करार दिया जाता है, तो मुमकिन है कि बर्मा पर लगे आर्थिक प्रतिबंधों में यूरोपीय संघ व अमेरिका कुछ छूट दे दें। हिलेरी क्लिंटन ने अपने बर्मा दौरे के दौरान इस तरह के वायदे भी किए थे।

बर्मा में पिछली बार 1990 में स्वतंत्र चुनाव हुए थे। उस चुनाव में एनएलडी पार्टी की जीत को सैनिक जुंटा ने नहीं माना था। इसलिए जिस तरह से वहां वर्षो से तानाशाही रही है, उसे देखते हुए रातोंरात बदलाव की उम्मीद कोई भोला इंसान ही करेगा। फिर भी, थेन सेन ने, जो खुद जुंटा के सदस्य थे, पिछले साल से जब से बर्मा के राष्ट्रपति का पदभार संभाला है, उन्होंने अपने सभी कदम सही दिशा में उठाए हैं। इसी महीने पार्लियामेंट को संबोधित करते हुए उन्होंने बर्मा में कानून के राज, आर्थिक उदारीकरण और बुनियादी ढांचे को मजबूत करने पर जोर दिया था। उन्होंने कहा कि अतीत में कई गलतियां हुई हैं। ‘हमारे देश के लोगों को अनेक सरकारों व विभिन्न शासन-व्यवस्थाओं में कष्ट भोगने पड़े हैं और लोग हमारी सरकार को भी इसकी उपलब्धियों की कसौटी पर कसेंगे.. इसलिए यह जरूरी है कि हम सरकार और देश के कई स्थानीय समूहों के बीच पसरी गलतफहमी को दूर करें।’ यह महत्वपूर्ण बात है कि थेन सेन ने सरकार के भीतर किसी तरह की कट्टरपंथी और उदारवादी खेमेबाजी से इनकार किया था।

लेकिन राष्ट्रपति के संबोधन के बाद एक चर्चित पत्रिका इर्रावड्डी ने टिप्पणी की कि ‘वरिष्ठ अधिकारियों के मुताबिक, सरकार बुरी तरह से बंटी हुई है।’ पत्रिका के अनुसार, ‘सरकार के भीतर के अनुदारवादी तत्व, जिनमें कई पूर्व जनरल भी शामिल हैं, लोकतांत्रिक विपक्ष के उदय को लेकर काफी सशंकित हैं।.. उनके लिए थेन सेन और उनके कुछ समर्थक उदारवादियों को किनारे लगाना बहुत मुश्किल नहीं होगा। खासकर यह जानते हुए कि थेन सेन 67 साल के हो चुके हैं और वर्ष 2015 के चुनावों के बाद देश में उनकी कोई बड़ी राजनीतिक भूमिका नहीं रह जाएगी।’

बर्मा के भीतर और बाहर के कई आशंकित विश्लेषकों का मानना है कि ये तमाम सुधार दरअसल बर्मा के आर्थिक विलगाव को समाप्त करने तथा एशिया व विश्व के मंचों पर मौजूदा सत्ता को मान्यता दिलाने के इरादे से किए जा रहे हैं। इस लिहाज से थेन सेन एक मुफीद मोहरा हैं। वैसे थेन सेन की सेहत बर्मा के भविष्य के लिए निर्णायक हो सकती है। विश्लेषक मिन जिन का कहना है कि राष्ट्रपति को दिल की बीमारी है और हाल ही में उन्हें पेस मेकर लगाया गया है। सरकार के मुख्य ज्योतिषी ने घोषणा की है कि थेन सेन इन गरमियों में बीमार पड़ेंगे। इस तरह की भविष्यवाणियों को बर्मा में काफी गंभीरता से लिया जाता है। और मिन जिन की मानें, तो यदि किन्हीं वजहों से सत्ता पर राष्ट्रपति की पकड़ कमजोर पड़ती है, तो ‘पुराने अनुभव यही कहते हैं कि बर्मा में तानाशाह ताकतें मजबूत हो सकती हैं और फिर सत्ता-संघर्ष देखने को मिल सकता है। यही नहीं, बर्मा के कमजोर राजनीतिक परिदृश्य को देखते हुए कई तरह की स्थितियां पैदा हो सकती हैं। मुमकिन है कि यहां कोई नया तानाशाह पैदा हो जाए, फौज हस्तक्षेप करे या फिर लोकतांत्रिक क्रांति की बयार ही बह उठे..।’

बहरहाल, इस तरह के निराशाजनक पूर्वानुमानों की सूची को विस्तार देना बहुत आसान है। तब तो और, जब थेन सेन द्वारा सामंजस्य की कोशिशों के बावजूद बर्मा की फौज अब भी देश के उत्तरी इलाके के कचिन अलगाववादियों से भयंकर जंग में जुटी हुई है। दूसरे स्थानीय अल्पसंख्यक समूहों के साथ भी उसका संघर्ष जारी है, क्योंकि इन इलाकों में गैर सरकारी संगठनों और मीडियाकर्मियों के प्रवेश पर पाबंदी लगी है।

जहां तक अंतरराष्ट्रीय चुनाव पर्यवेक्षकों को इजाजत देने की बात है, तो ज्यादातर लोगों को हकीकत के आकलन के लिए बहुत कम वक्त मिला है। इन पर्यवेक्षकों में अमेरिकी और ब्रिटिश ऑब्जर्वर भी शामिल हैं, आंग सान सू की के पार्टी के प्रवक्ता ने तो पहले ही कहा था, ‘आखिर अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षक चुनावों की जालसाजी कैसे पकड़ सकते हैं, उन्हें तो चुनावों से महज दो-तीन दिन पहले बर्मा में आने की अनुमति मिली?’ बर्मा में भ्रष्टाचार अपने चरम पर है, नया मीडिया कानून प्रेस की आजादी को बाधित करता है, शांतिपूर्ण सम्मेलन के अधिकार से संबंधित कानून वाहियात है।

इस बीच लोकतंत्र समर्थक नेता आंग सान सू की को आगाह भी किया जा रहा है कि इन उप-चुनावों में शिरकत करके वह बुनियादी तौर पर गैरकानूनी प्रक्रिया को वैधता प्रदान कर रही हैं और उन्हें इसकी भारी राजनीतिक कीमत चुकानी पड़ेगी। कहा जा रहा है कि ‘सरकार के साथ अधिक सहयोग उनकी छवि को मलिन कर सकता है।..मान लें कि उन्हें विजयी होने की इजाजत दे भी दी जाती है, तो वह अधिक समय तक बर्मा की राजनीतिक आकांक्षाओं की आदर्श आवाज नहीं रह पाएंगी, बल्कि उनका कद सामान्य राजनेता-सा हो जाएगा।..क्या वह लोगों को निराश करेंगी?’

निश्चित रूप से ये तमाम आपत्तियां निराधार और बेवजह नहीं हैं, फिर भी इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि पिछले 12 महीनों से भी कम समय में बर्मा का राजनीतिक परिदृश्य अभूतपूर्व रूप से बदला है। और यह परिवर्तन सकारात्मक है। अरब की क्रांति के उलट यह एशियाई क्रांति अब तक शांतिपूर्ण रही है। जाहिर है, सुधार के विफल होने की कई वजहें हो सकती हैं, लेकिन उसे विफल होने देने का कोई बहाना नहीं हो सकता।
साभार: द गार्जियन
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

 

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:म्यांमार की दहलीज पर नई सुबह?