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अमेरिका के कितने करीब होगा ब्रिक्स

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से ही नए वित्तीय संगठन बनाने की शुरुआत हो गई थी। यह सब अमेरिका और उसके मित्र राष्ट्रों की अगुवाई में हुआ। इसलिए इस व्यवस्था पर उनका ही दबदबा रहा। और मौजूदा वैश्विक व्यवस्था इसी बुनियाद पर टिकी है। हालांकि इस व्यवस्था ने काफी देशों को उपेक्षित रखा है। यह विश्व बैंक, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और जी-7 के प्रमुखों के चयन में स्पष्ट तौर पर दिखता है। पिछले हफ्ते ही नई दिल्ली में ब्रिक्स देशों की शिखर बैठक हुई। यह नई वैश्विक व्यवस्था धीरे-धीरे आगे तो बढ़ रही है, पर ये भी साफ है कि यह अपने वास्तविक मकसद से दूर होती जा रही है। खैर, इस बदलाव की गति व प्रकृति मौजूदा वैश्विक व्यवस्था पर निर्भर करेगी और इस पर भी कि नई व्यवस्था पुरानी के साथ मिलकर काम करना चाहती है या इससे टकराव लेना चाहती है। वैसे एक धारणा यह बनी है कि ब्रिक्स देशों में वित्तीय एकजुटता की भावना आएगी। वे स्वयं के लिए विकास बैंक बनाएंगे, पुरानी व्यवस्था को टक्कर देने के लिए इनके अपने ढांचे होंगे। आगे चलकर यह संगठन पश्चिम विरोधी गुट बन जाएगा। हालांकि उचित यही होगा कि ब्रिक्स पश्चिमी मान्यताओं के तहत गैर-समावेशी ढांचों पर जोर दे। परंतु, संकेतों के मुताबिक, पश्चिमी मॉडल का पालन संभव नहीं है। इसकी तीन वजहें हैं।

पहली, ब्रिक्स देशों के बीच मतभेद हैं, जो संयुक्त मोर्चे की संभावना को खारिज करते हैं। खास तौर पर यह भारत-चीन संबंध के आलोक में काफी हद तक सच है। अलग-अलग राजनीतिक विचारधारा के अलावा दोनों देशों के बीच काफी समय से सीमा विवाद है। तिब्बत का मुद्दा है, सो अलग। जाहिर है, इनसे आपसी भरोसे में कमी आई है। दिल्ली घोषणापत्र में यह कमी साफ तौर पर झलकी। इस बैठक में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार की मांग तो की गई, पर भारत की स्थायी सदस्यता के मुद्दे पर एक राय नहीं दिखी।

दूसरी वजह यह है कि ब्रिक्स एक वैकल्पिक दृष्टिकोण का नेतृत्व करने में या तो अक्षम है या इसके सदस्य देश अगुवा बनने को तैयार नहीं। यह हाल तब है, जब इसने पश्चिमी जगत के कई फैसलों को चुनौती दी है। विश्व बैंक व आईएमएफ के नेतृत्व पर सवाल उठाए। ईरान व सीरिया के मसले पर भी सदस्य देशों के विचार अलग थे। सबसे अंत में, ब्रिक्स के सभी देशों के अमेरिका से कूटनीतिक संबंध हैं। वे वाशिंगटन के साथ संबंध बढ़ाने पर जोर देते हैं। इसलिए अमेरिका से भिड़ने के मूड में कोई भी नहीं है। वास्तव में, वाशिंगटन सभी देश के लिए अहम है। हो सकता है कि अमेरिका को ब्रिक्स में शामिल होने के लिए आमंत्रित किया जाए या उसे पर्यवेक्षक ही बनाया जाए। इससे पश्चिम विरोधी धारणा ही नहीं टूटेगी, बल्कि मौजूदा व उभरती हुई व्यवस्था के बीच सहयोग का माहौल भी बनेगा। ब्रिक्स और अमेरिका की नजदीकी सबके लिए फायदेमंद है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं) 

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