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पंच से पार्षदी तक कुरसी की जंग

दो विश्व युद्ध अब तक लड़े जा चुके हैं। पानी के लिए तीसरे से सब डर गए। इसीलिए चौथे विश्व युद्ध के बारे में कहते हैं कि वह पत्थरों से लड़ा जाएगा। अब पत्थरों से तो कह दिया, मगर पत्थर चलाने वाले कौन-से बचकर रह जाएंगे। इसलिए मैं कहता हूं कि न तीसरे की जरूरत है और न चौथे की।

अलबत्ता एक जंग पहले-दूसरे विश्व युद्ध से लेकर आज तक लड़ी जा रही है, और वह है कुरसी की जंग। यह जंग यूनाइटेड नेशंस से लेकर निगम की पार्षदी तक, बल्कि पंच-सरपंच क्या, ऑफिस दर ऑफिस छिड़ी है। किसी को ओबामा के करीब वाली कुरसी चाहिए, तो कोई उत्तराखंड में मुख्यमंत्री की कुरसी पर ही संतोष कर लेना चाहता है। विधायक-सांसद तो मंत्रिमंडल की अदद कुरसी के लिए एक-दूसरे पर माइक-कुरसी फेंकते रहते हैं। काश! कुछ नेता मर-खपकर शहीदी का दर्जा पाते।

कुरसी के अभिलाषी नेताओं की फौज मौज-मस्ती में है। जनता फाकामस्ती में है। जनता के प्रतिनिधि निधियों पर पलते हैं। इन्हें सत्ता सौंपकर भला कोई कभी चैन से कैसे सो सकता है? वैसे भी, भूखे को नींद कैसे आ सकती है? फलत: जनता भी कुपोषण की शिकार है।

अभी हाल ही में एक विचित्र गांव मिला। वह गांव तरक्की की परिभाषा को ही धता बता रहा है। वहां पहली नहीं, दूसरी बीवी से पहली संतान पैदा होती है। बेटी बचाओ का संकल्प ही नहीं। वहां तो डबल आंकड़ा स्त्रियों का चाहिए। जनसंख्या का मोर्चा युद्ध से कम नहीं है। सरकार और जनता के इस जंग में भी नसबंदी आदि के प्रयास में जुटे कर्मचारी पिस रहे हैं। इसलिए यह जंग शांति और प्रेम की है।

स्टार वार तो अब अंतरिक्ष में जमने को है। किसी ने चांद ध्वस्त कर दिया, तो एक नि:शुल्क प्राकृतिक बल्ब ऐसे ही बुझ जाएगा। इसलिए दुनिया में अहिंसा की सख्त जरूरत है। बापू के चरण चिन्हों की जरूरत नभ में भी आवश्यक लग रही है। बहरहाल, युद्धम देहि का संवाद अमेरिका को भी छोड़ना चाहिए, वरना चारों तरफ लादेन और जवाहिरी खड़े नजर आएंगे। इसलिए बापू के मार्ग पर चलना बहुत जरूरी है। युद्ध के पुजारी सावधान! शांति के मार्गी बनें।

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  • Web Title:पंच से पार्षदी तक कुरसी की जंग