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दोस्ती का सफर

सन 2005 में पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति जनरल परवेज मुशर्रफ की बहुचर्चित भारत यात्रा के बाद पहली बार पाकिस्तानी सदर भारत आ रहे हैं। आसिफ अली जरदारी अजमेर में ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह की जियारत के लिए भारत आ रहे हैं। कहने को तो यह उनकी निजी यात्रा है, पर एक देश का राष्ट्रपति जब दूसरे देश जाता है, तो उसकी यात्रा निजी रह नहीं पाती। खास तौर पर भारत और पाकिस्तान के रिश्तों के मद्देनजर ऐसा मुमकिन नहीं है। जरदारी के कार्यक्रम में प्रधानमंत्री से मुलाकात भी है और इस मुलाकात पर सबकी नजर होगी। जनरल मुशर्रफ के राष्ट्रपति कार्यकाल में भारत-पाकिस्तान के रिश्ते अच्छे हो चले थे और यह उम्मीद भी बंध रही थी कि दोनों देशों के बीच की समस्याएं शायद हल हो जाएंगी या कम से कम निर्णायक दिशा में बढ़ेंगी। जनरल मुशर्रफ भी अजमेर जाना चाहते थे, लेकिन वह जा नहीं पाए। इसके बाद पाकिस्तानी राजनीति में मुशर्रफ के कमजोर होते जाने से शांति की उम्मीदें धूमिल हो गई थीं। इस बार जरदारी अजमेर की जियारत भी कर लेंगे, ऐसी उम्मीद है और यह भी लगता है कि कोई बहुत महत्वपूर्ण पहल भले न हो, लेकिन बातचीत से अच्छे नतीजे निकलेंगे। पिछले दिनों भारत और पाकिस्तान के बीच कई क्षेत्रों में उच्चस्तरीय बातचीत हुई है। इसके मद्देनजर डॉ. मनमोहन सिंह और आसिफ अली जरदारी की मुलाकात से रिश्ते बेहतर करने में कुछ कामयाबी मिल सकती है। यह बात सही है कि पाकिस्तान में असैनिक सरकार एक ओर सेना, दूसरी तरफ अदालत और तीसरी ओर अमेरिका के दबाव में है, इसलिए बड़े फैसले करने की उसकी हैसियत नहीं है। लेकिन जितने संकटों में वह कुछ दिन पहले घिरी हुई थी, उतनी अब नहीं है। अदालत का दबाव भी कुछ घटा है और अदालत और सेना में जैसी साठगांठ पहले दिख रही थी, वैसी नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने सेना की निरंकुशता को भी चुनौती दी है। सबसे बड़ी बात यह है कि असैनिक सरकार से नाराज जनता भी फौजी राज नहीं चाहती और सेना को भी लग रहा है कि बदली हुई परिस्थितियों में सीधे-सीधे सत्ता हथियाना समझदारी नहीं है। दोनों बड़ी राजनीतिक पार्टियां पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी) और विपक्षी मुस्लिम लीग (नवाज शरीफ) के बीच जितने भी मतभेद हों, लेकिन ये दोनों राजनीतिक दल जानते हैं कि सैनिक शासन दोनों के हित में नहीं है, इसलिए वे अपने राजनीतिक विरोध को एक हद से ज्यादा बढ़ने नहीं देना चाहते।
सत्तारूढ़ नेता जानते हैं कि सेना व कट्टरपंथियों का दबाव कम करने के लिए भारत से बेहतर संबंध जरूरी है। महत्वपूर्ण बात यह है कि फिलहाल दोनों पक्षों का जोर आर्थिक संबंध सुधारने पर है। सीमा विवाद या कश्मीर मसले पर तो फिलहाल कोई बड़ी पहल मुमकिन नहीं दिखती, लेकिन अगर दोनों देशों की एक-दूसरे पर आर्थिक निर्भरता बढ़ती है, तो इससे रिश्तों पर बड़ा असर पड़ेगा। भारत और पाकिस्तान के बीच अविश्वास की वजह से सिर्फ इन दोनों देशों का नहीं, समूचे भारतीय उपमहाद्वीप की आर्थिक तरक्की को नुकसान पहुंचता है। अगर पाकिस्तान, भारत और बांग्लादेश को जोड़ने वाले राजमार्ग या रेलमार्ग बन जाएं, तो इससे भारतीय उपमहाद्वीप की अर्थव्यवस्था को बड़ा प्रोत्साहन मिलेगा। यह बात भी सही है कि भारत-पाक रिश्तों में बड़ी उम्मीदें नहीं रखनी चाहिए, क्योंकि इनमें बड़े उतार-चढ़ाव आते रहे हैं, लेकिन यह भी उतना ही सच है कि संवाद और अच्छे संबंधों की कोशिशें जारी रहनी चाहिए, आखिर दो पड़ोसी लगातार दुश्मनी की मुद्रा में नहीं रह सकते।

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