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विज्ञान और अंधविश्वास

कई सारे वैज्ञानिक मुद्दों पर विवाद है। चाहे वह जलवायु परिवर्तन का मुद्दा हो या स्टेम सेल रिसर्च का। यहां तक कि जीव-जंतुओं का जन्म कैसे हुआ, इस पर भी एक राय नहीं बन पाई है। ऐसे में, हमें शायद एक नए अध्ययन की जरूरत पड़े, जो यह बताए कि वैज्ञानिक हमारे निशाने पर सबसे ऊपर हैं। उत्तरी कैलिफोर्निया के शोधार्थी गॉर्डन गाउच का शोध-पत्र हाल ही में प्रकाशित हुआ है, जिसने इस सोच को एक अलग दिशा दी है। दरअसल, हमारी समझ और पूर्व के शोधों के मुताबिक, विज्ञान पर विश्वास न होने का मतलब है कि हमारी शिक्षा में कोई कमी रह गई है। जितना कम हम शिक्षित होंगे, हमारी सोच उतनी ही ज्यादा परंपरावादी होगी। यानी वैज्ञानिक तथ्यों की अपेक्षा हम धार्मिक पोंगापंथियों पर ज्यादा भरोसा करेंगे। यहां तक कि इस सिद्धांत को एक शैक्षणिक नाम भी दिया गया है। इसे कहते हैं वैज्ञानिक साक्षरता का ‘डेफिसिट मॉडल।’ लेकिन, बात जब आधुनिक लकीर के फकीर की होती है, तो यह मॉडल लागू नहीं होता। इसे साबित करने के लिए गॉर्डन ने 1972 के जनरल सोसायटी सर्वे का विश्लेषण किया। गॉर्डन ने पाया कि परंपरावादी मूल्यों को मानने वाले स्नातक के छात्र हाई स्कूल पास छात्र की तुलना में विज्ञान पर कम यकीन करते हैं। हालांकि यह प्रगतिशील लोगों व नरमपंथियों पर लागू नहीं होता। विज्ञान को लेकर इनके विचार तो सदियों से एक समान ही हैं। तो फिर इसकी वजह क्या है? गॉर्डन इसे परिभाषित इस तरह से करते हैं कि जो परंपरावादी जितना अधिक पढ़ा-लिखा होता है, उसकी राजनीतिक व्यस्तताएं भी उतनी ही अधिक होती हैं। और वह उन्हीं सूचनाओं को पसंद करता है, जो उसकी विचारधारा को पुष्ट करती हैं। हाल के वर्षो में तो ऐसे लोगों को राजकाज के भी काफी मौके मिले हैं। दक्षिणपंथी विचारकों को कॉरपोरेट घरानों का संरक्षण प्राप्त होता है, ताकि वे वैज्ञानिक मतों को कमतर कर सकें। वे टीवी चैनलों, ब्लॉगों व रेडियो के जरिये लोगों तक अपने संदेश पहुंचाते हैं। आम तौर पर इनके जरिये ही वे सुशिक्षित दर्शकों व श्रोताओं तक पहुंच सकते हैं और प्रकारांतर से भ्रम भी फैला सकते हैं।
लॉस ऐंजिलिस टाइम्स, अमेरिका

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