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अष्ट सिद्घि, नौ निधि के दाता

भगवान हनुमान सर्वगुण सम्पन्न हैं। आप अखण्ड ब्रह्मचर्य, बुद्घिमत्ता-विद्वता, चतुरता, बल-पौरुष, साहस और सदाचार आदि गुणों से परिपूर्ण हैं। बता रही हैं पूनम वार्ष्णेय

एक दिन भगवान राम से लक्ष्मण ने यों ही पूछ लिया कि प्रभु आप सबसे ज्यादा किससे प्रेम करते हैं। माता सीता भी साथ ही बैठी थीं। भगवान राम मुस्कुराए और आंखें बंद कर लीं। बंद आंखों से भगवान राम अपने प्रिय भक्त हनुमान को निहार रहे थे। कुछ क्षण पश्चात् भगवान ने आंखें खोलीं और लक्ष्मण से कहा कि समय आने पर मैं सभी को बताऊंगा कि मैं सबसे ज्यादा किससे प्रेम करता हूं। समय पंख लगाकर उड़ने लगा। माता सीता का हरण हुआ। यह जानने के बाद कि सीता का हरण रावण ने किया है, राम ने रावण के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी। युद्ध के समय की घटना है। मेघनाद की शक्ति से मूर्च्छित होकर लक्ष्मण राम की गोद में थे। मर्यादा पुरुषोत्तम राम अपने अनुज की इस दशा को देख करुण विलाप कर रहे थे। लेकिन संकट के इन क्षणों में भगवान को उनके भक्त और दास हनुमान ने उबारा। लक्ष्मण को पुनर्जीवन मिला। राम ने उन्हें गले लगाते हुए कहा, ‘‘तुम मम प्रिय भरत सम भाई।’’ ऐसे एक-दो नहीं बल्कि अनेक अवसर आए, जब हनुमान ने भगवान राम को संकटों से उबारा।

यह हनुमान और कोई नहीं बल्कि रुद्र के ग्यारहवें अवतार मां अंजनी और केसरी के पुत्र बजरंग बली हैं। इंद्र के वज्र से इनकी हनु (ठुड्डी) टेडी हो गई, जिससे इनका नाम हनुमान हुआ। हनुमान के पालक पिता वायु देव हैं। सूर्य देव के शिष्य हनुमान ने कौतुहलवश ऐसे कई कार्य किए, जिससे सबको आश्चर्य हुआ- जैसे सूर्य को निगलने की घटना। 

हनुमान जी के विभिन्न रूप
प्राण रक्षक हनुमान: संजीवनी बूटी लाकर लक्ष्मणजी के प्राण बचाए। लंका में माता सीता त्रिजटा से मरने के लिए अग्नि मांग रही थीं, उसी समय हनुमान ने राम की मुद्रिका देकर मां को शान्त किया।

मेघनाथ ने रामजी को नाग पाश में बांध लिया। हनुमान गरुड़ को बुला लाये और उन्हें बंधन मुक्त किया। हनुमान अहिरावण से भी बचा कर राम और लक्ष्मण को कंधे पर बैठा कर ले आये थे।

कथावाचक हनुमान: लंका जाकर हनुमान जी ने प्रथम वार विभीषण को रामसीता की  मधुर कथा सुनाई। बाद में अशोक वाटिका में माता सीता को राम कथा एवं राम नाम गान करके सुनाया।

संकटमोचक हनुमान: भूतप्रेत, डाकिनी, शाकिनी, बेताल आदि के संकटों से बचाने के लिये केवल हनुमान सक्षम हैं। यह प्रभाव मेंहदीपुर बालाजी में देखा जा सकता है। वहां अदृश्य शक्तियां लोगों के संकट हर लेती हैं।

भक्त और सेवकों में अग्रगण्य हनुमान: माता सीता की खबर लाने के लिये हनुमान उद्यत हुए और लंका पहुंच गये। लंका में राम जी का यशगान करते हुए रावण को उपदेश दिया कि सीता जी को लौटाने में ही भलाई है। अयोध्या में प्रतिदिन हनुमान जी राम जी के सभी कार्य करते थे।
श्रीराम कथा के अद्भुत श्रोता हनुमान: अयोध्या छोड़कर श्रीराम वैकुंठ जाने लगे, तब राम की आज्ञा से हनुमान पृथ्वी पर ही रहे। जहां कहीं राम कथा होती है, वहां हनुमान किसी न किसी रूप में अवश्य पहुंचते हैं।

हनुमान भक्तों को शानि पीड़ा नहीं होती
रावण ने सभी ग्रहों को लंका में बन्दी बना लिया था। हनुमान ने वहां पहुंच कर सभी को बंधन मुक्त कराया। उस समय शनि देव ने वायदा किया कि वे हनुमान भक्तों को कभी परेशान नहीं करेंगे।

अहंकार रहित विनयशील महावीर
श्रीराम ने एक बार सारी सभा के सामने प्रश्न किया कि तुम समुद्र कैसे पार कर गए। अतुलित बल के स्वामी होते हुए भी आपने उत्तर दिया कि आपकी मुद्रिका के प्रभाव से समुद्र पार कर लिया। फिर रामजी ने पूछा, आपने लंका कैसे जलाई तो उत्तर दिया मां के दुख के कारण निकलने वाली गरम-गरम सांसों से लंका जला दी। अभिप्राय यह है कि भगवान के अन्दर केवल विनयशीलता और
उदारता है।

कार्य सिद्घि करने वाले बजरंग बली
सुबह-शाम, एक निश्चित समय, श्रद्घापूर्वक हनुमान चालीसा, संकटमोचन हनुमानष्टक बजरंगवाण नित्य पाठ करने से सभी कार्य सिद्घ हो जाते हैं। प्रत्येक मंगलवार सुंदरकांड का पाठ करें तो यह अत्यन्त लाभदायक है। कहते हैं, सुदरकान्ड भगवान हनुमान ने लिखा है।

वीर हनुमान अपनी भक्ति और बलबुद्घि से चारों युगों में पूजनीय बने हुए हैं। यही कारण है कि पूरे भारत में हनुमान जी के सबसे ज्यादा मंदिर हैं। इसका कारण यह है कि आप दुखियों की आवाज तुरंत सुनते हैं, सभी की समस्याओं का समाधान करते हैं। बाबा बड़े दयालु हैं। जटिल समस्याओं का हल तुरंत कर देते हैं। असंभव को संभव बनाने में भगवान हनुमान जी की कृपा अत्यन्त आवश्यक है।

अष्ट सिद्धि-नौ निधि के दाता
हनुमान जी को अष्ट सिद्धि और नौ निधि के दाता माना जाता है। ये अष्ट  सिद्धियां अणिमा, लघिमा, गरिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, महिमा, ईशित्व और वशित्व हैं।

अणिमा सिद्धि से व्यक्ति में सूक्ष्म रूप धरने की क्षमता आ जाती है। लघिमा में शरीर को छोटा किया जा सकता है, तो गरिमा में अपने शरीर को जितना चाहे भारी बना सकते हैं। प्राप्ति सिद्धि में मात्र अभिलाषा करने से ही वस्तु की प्राप्ति हो जाती है। प्राकाम्य में इनसान जो चाहता है, वह हो जाता है। महिमा से अपने शरीर को जितना चाहे विशाल कर सकता है। ईशित्व से प्रभुत्व और अधिकार की प्राप्ति होती है। वशित्व से किसी को भी वश में किया जा सकता है। इसी प्रकार नव रत्नों को ही नौ निधि कहा जाता है। ये हैं-पद्म, महापद्म, शंख, मकर, कच्छप, मुकुंद, कुंद, नील और खर्व।

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